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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 9
राजा--एते क्लान्तमनसः पुनर्नवीकृताः स्मः । (इति परिक्रामति) । प्रतिहारी-एषोऽभिनवसम्मार्जनसभश्रीकः सत्निहितहोमधेनुरग्निशरणालिन्दः । आरोहतु देवः । राजा- (आरुह्य परिजनांसावलम्बी तिष्ठति) वेत्रवति, किमुदिश्य भगवता काश्यपेन मत्सकाशमृषयः प्रेषिताः स्युः ? किं तावद्‌ त्रतिनामुपोढतपसां विध्नैस्तपो दूषितं धमरिण्यचरेषु केनचिदुत प्राणिष्वसच्चेष्टितम्‌ । आहोस्वित्‌ प्रसवो ममापचरितैर्विष्टम्भितो वीरुधामित्यारूढबहुप्रतर्कमपरिच्छेदाकुलं मे मनः।।
राजा:-- (इस स्तुति-पाठ को सुनकर) यह थके मन वाला मैं फिर नवीन (अर्थात्‌ ताजा) कर दिया गया हूँ । (घूमता है) । प्रतिहारी:-- अभी की गयी सफाई के कारण शोभायमान और हवन के (घृतादि के) लिये उपयोगी समीपस्थ गाय से युक्त यह यज्ञशाला का चबूतरा (आलिन्द्‌) है । महाराज (इस पर) चढ़ें । राजा:-- (चढ़कर सेविका के कन्धे का सहारा लेते हुये खड़ा होता है) वेत्रवती, किस उदेश्य से पूजनीय कण्व के द्वारा मेरे पास ऋषि भेजे गये होंगे ? क्या महान्‌ तपस्वी व्रती (ऋषियों) की तपस्या विघ्नो के द्वारा दूषित कर दी गयी है ? अथवा तपोवन में विचरण करने वाले प्राणियों (जीवों) पर किसी के द्वारा अनुचित व्यवहार (हिंसा आदि) किया गया है ? अथवा मेरे किन्हीं कुकृत्यो के कारण लताओं का प्रसव (उनमें पफूल-फल आना) रुक गया है ? इस प्रकार उत्पन्न अनेक शङ्काओं से ग्रस्त मेरा मन (कुछ भी) निर्णय (निश्चय) न कर सकने के कारण (व्याकुल हो रहा है) ।
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