राजा:--
(इस स्तुति-पाठ को सुनकर) यह थके मन वाला मैं फिर नवीन (अर्थात् ताजा) कर दिया गया हूँ । (घूमता है) ।
प्रतिहारी:--
अभी की गयी सफाई के कारण शोभायमान और हवन के (घृतादि के) लिये उपयोगी समीपस्थ गाय से युक्त यह यज्ञशाला का चबूतरा (आलिन्द्) है । महाराज (इस पर) चढ़ें ।
राजा:--
(चढ़कर सेविका के कन्धे का सहारा लेते हुये खड़ा होता है) वेत्रवती, किस उदेश्य से पूजनीय कण्व के द्वारा मेरे पास ऋषि भेजे गये होंगे ? क्या महान् तपस्वी व्रती (ऋषियों) की तपस्या विघ्नो के द्वारा दूषित कर दी गयी है ? अथवा तपोवन में विचरण करने वाले प्राणियों (जीवों) पर किसी के द्वारा अनुचित व्यवहार (हिंसा आदि) किया गया है ? अथवा मेरे किन्हीं कुकृत्यो के कारण लताओं का प्रसव (उनमें पफूल-फल आना) रुक गया है ? इस प्रकार उत्पन्न अनेक शङ्काओं से ग्रस्त मेरा मन (कुछ भी) निर्णय (निश्चय) न कर सकने के कारण (व्याकुल हो रहा है) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।