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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 18
राजा-- कि चात्रभवती मया परिणीतपूर्वा ? शकुन्तला- (सविषादम्‌ । आत्मगतम्‌) हृद्य, साम्प्रतं ते आशङ्का । शार््खगरवः- किं कृतकाद्िषो धर्म प्रति विमुखता कृतावज्ञा । राजा-- कुतोऽ यमसत्कल्पनाप्रशनः ? शार््गरवः- मूर्च्छन्त्यमी विकाराः प्रायेणौश्चर्यप्रमत्तेषु ।।
राजा:-- तो क्या यह आदरणीय मेरे द्वारा पहले कभी विवाहित हैं (अर्थात्‌ तो क्या मेने पहले इनसे विवाह किया है) ? शकुन्तला:-- (खेदपूर्वक अपने मन में) हृदय तुम्हारी आशङ्का ठीक ही थी । शाङ्खगरव:-- क्या आपका अपने किये गये कार्य के प्रति द्वेष (घृणा) है अथवा धर्म के प्रति (आपकी) विमुखता है अथवा किये गये कार्य का (जान बूज कर) तिरस्कार है ? राजा:-- यह असत्य (झूठी) कल्पना वाला प्रश्न कहाँ से उठ रहा है ? शाङ्खगरव:-- ऐश्वर्य (समृद्धि) के कारण मदान्ध लोगों में प्रायः ये विकार (अवगुण) बढ़ जाते हैं ।
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