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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 30
पुरोहितः- (विचार्य) यदि तावदेवं क्रियताम्‌ । राजा-- अनुशास्तु मां भवान्‌ । पुरोहितः- अत्रभवती तावदाप्रसवादस्मद्गृहे तिष्ठतु । कुत इदमुच्यते इति चेत्‌ त्वं साधुभिरादिष्टपूर्वः प्रथममेव चक्रवर्तिनं पुत्रं जनयिष्यसीति । स चेन्मुनिदौहिन्नस्तल्लक्चणोपपन्नो भविष्यति, अभिनन्द्य शुद्धान्तमेनां प्रवेशयिष्यसि । विपर्यये तु पितुरस्याः समीपनयनमवस्थितमेव । राजा--यथा गुरुभ्यो रोचते । पुरोहितः- वत्से, अनुगच्छ माम्‌ । शकुन्तला-- भगवती वसुधे, देहि मे विवरम्‌ । (इति रुदती प्रस्थिता । निष्क्रान्ता सह पुरोधसां तपस्विभिश्च) (राजा शापव्यवहितस्मृतिः शकुन्तलागतमेव चिन्तयति) (नेपथ्ये) आश्चर्यमाश्चर्यम्‌ । राजा- (आकर्ण्य) किं नु खलु स्यात्‌ ? (प्रविश्य) पुरोहितः- (सविस्मयम्‌) देव; अद्भुतं खलु संवृत्तम्‌ । राजा-- किमिव ? पुरोहितः-देव, परावृत्तेषु कण्वशिष्येषु-- सा निन्दन्ती स्वानि भाग्यानि बाला बाहूत्केप क्रन्दितुं च प्रवृत्ता । राजा - किं च? पुरोहितः--सखीसंस्थानं चाप्सरस्तीर्थमारादुत्छ्षिप्यैनां ज्योतिरेकं जगाम ।।
पुरोहित:-- (विचार कर) यदि (ऐसी बात है) तो इस प्रकार कीजिये । राजा:-- आप मुझे आदेश दें । पुरोहित:-- तो ये मान्य (शकुन्तला) (सन्तानोत्पत्ति) तक हमारे घर रहें । यदि (आप यह पूछें कि) यह (मेरे द्वारा) क्यों कहा जा रहा है ? (तो सुनें) आप को (ज्योतिर्विद्‌) महात्माओं द्वारा पहले ही बताया गया है कि आप सर्वप्रथम ही चक्रवर्ती पुत्र को उत्पन्न करेंगे । यदि वह मुनि (कण्व) का दौहित्र (पुत्री से उत्पन्न पत्र) उस (चक्रवर्ती) के लक्षण से युक्त होगा, (तो) अभिनन्दन कर इन (माननीय शकुन्तला) को अन्तःपुर में प्रवेश कराइयेगा । अन्यथा ( इसके विपरीत होने पर) तो इनका (इनके) पिता (कण्व) के समीप भेजना निश्चित ही है । राजा:-- जैसा गुरुजन को अच्छा लगे (वैसा ही होगा) । पुरोहित:-- बेटी, मेरे पीछे-पीछे आओ । शकुन्तला:-- हे भगवती वसुन्धरा (हे पृथ्वी माता), मुझे (अपने अन्दर) छिद्र (स्थान) दो। (रोती हई प्रस्थान करती है । पुरोहित और तपस्वियो के साथ निकल जाती है) (शाप से लुप्त स्मृति वाला राजा शकुन्तला के ही विषय में विचार करता है) । (नेपथ्य में) आश्वर्य है, आशर्य है । राजा:-- (सुनकर) क्या हो गया है ? (प्रवेश करके) पुरोहित:-- (आशर्य के साथ) महाराज, बड़ा आश्चर्य हो गया है । राजा:-- कैसा ? पुरोहित:-- महाराज, कण्व के शिष्यों के लौट जाने पर वह बाला (शकुन्तला) अपने भाग्य की निन्दा करती हुई हाथों को उठाकर रोने लगी । राजा:-- तब फिर क्या हुआ ? पुरोहित:-- शची- तीर्थ (अप्सरा-तीर्थ) के पास ही स्त्री के समान आकार वाली एक ज्योति (तेजोमयी मूर्ति) उस (शकुन्तला) को उठाकर चली गयी (अर्थात्‌ अदृश्य हो गयी) ।
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