पुरोहित:--
(विचार कर) यदि (ऐसी बात है) तो इस प्रकार कीजिये ।
राजा:--
आप मुझे आदेश दें ।
पुरोहित:--
तो ये मान्य (शकुन्तला) (सन्तानोत्पत्ति) तक हमारे घर रहें । यदि (आप यह पूछें कि) यह (मेरे द्वारा) क्यों कहा जा रहा है ? (तो सुनें) आप को (ज्योतिर्विद्) महात्माओं द्वारा पहले ही बताया गया है कि आप सर्वप्रथम ही चक्रवर्ती पुत्र को उत्पन्न करेंगे । यदि वह मुनि (कण्व) का दौहित्र (पुत्री से उत्पन्न पत्र) उस (चक्रवर्ती) के लक्षण से युक्त होगा, (तो) अभिनन्दन कर इन (माननीय शकुन्तला) को अन्तःपुर में प्रवेश कराइयेगा । अन्यथा ( इसके विपरीत होने पर) तो इनका (इनके) पिता (कण्व) के समीप भेजना निश्चित ही है ।
राजा:--
जैसा गुरुजन को अच्छा लगे (वैसा ही होगा) ।
पुरोहित:--
बेटी, मेरे पीछे-पीछे आओ ।
शकुन्तला:--
हे भगवती वसुन्धरा (हे पृथ्वी माता), मुझे (अपने अन्दर) छिद्र (स्थान) दो।
(रोती हई प्रस्थान करती है । पुरोहित और तपस्वियो के साथ निकल जाती है)
(शाप से लुप्त स्मृति वाला राजा शकुन्तला के ही विषय में विचार करता है) ।
(नेपथ्य में) आश्वर्य है, आशर्य है ।
राजा:--
(सुनकर) क्या हो गया है ?
(प्रवेश करके) पुरोहित:--
(आशर्य के साथ) महाराज, बड़ा आश्चर्य हो गया है ।
राजा:--
कैसा ?
पुरोहित:--
महाराज, कण्व के शिष्यों के लौट जाने पर वह बाला (शकुन्तला) अपने भाग्य की निन्दा करती हुई हाथों को उठाकर रोने लगी ।
राजा:--
तब फिर क्या हुआ ?
पुरोहित:--
शची- तीर्थ (अप्सरा-तीर्थ) के पास ही स्त्री के समान आकार वाली एक ज्योति (तेजोमयी मूर्ति) उस (शकुन्तला) को उठाकर चली गयी (अर्थात् अदृश्य हो गयी) ।
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