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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 11
शारद्वतः-- स्थाने भवान्‌ पुरप्रवेशादित्थंभूतः संवृत्तः । अहमपि-- अभ्यक्तमिव स्नातः शुचिरशुचिमिव प्रबुद्ध इव सुप्तम्‌ । बद्धमिव स्वैरगतिर्जनमिह सुखसङ्गिनमवैमि ।।
शारद्वतः:-- यह ठीक ही है कि आप नगर (पुर) में प्रवेश करने से इस प्रकार के हो गये हैं (अर्थात्‌ ऐसा आप को अनुभव हो रहा है) । मैं भी यहाँ के सुखों में आसक्त लोगों को मैं उसी प्रकार समझ रहा हूँ जिस प्रकार नहाया हुआ व्यक्ति तेल लगाये हुये व्यक्ति को, पवित्र व्यक्ति अपवित्र को, जगा हुआ व्यक्ति सोये हुये को और स्वच्छन्द विचरण करने वाला व्यक्ति बंधे हुये को (समझता है) ।
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