प्रतीहारी:--
महाराज, कौतूहल (जिज्ञासा) पूर्वक भेजा गया (प्रेषित) भी मेरा अनुमान (निश्चय की ओर) नहीं फैल (बढ़) पा रहा है (अर्थात् जिज्ञासा होते हुये भी मैं अपने अनुमान से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में असमर्थ हूँ) इसकी आकृति मनोहर (दर्शनीय) प्रतीत हो रही है ।
राजा:--
ठीक है, (किन्तु) दूसरे की स्त्री को ध्यान से नहीं देखना चाहिये ।
शकुन्तला:--
(हाथ को छाती पर रखकर । अपने मन में) हदय, क्यों इस प्रकार कांप रहे हो । आर्यपुत्र के (पूर्व-प्रदर्शित) प्रेम को समझ कर धैर्य तो धारण करो ।
पुरोहित:--
(आगे जाकर) विविधत् पूजित ये तपस्वी लोग (उपस्थित हैं) । इनके गुरु जी का कुछ सन्देश है । महाराज उसे सुनने की कृपा करें ।
राजा:--
मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ ।
ऋषि लोग:--
(हाथों को उठाकर) हे राजन् , आप की जय हो ।
राजा:--
मैं सभी को प्रणाम करता हूँ ।
ऋषि लोग:--
अभीष्ट वस्तु से युक्त होवें (अर्थात् अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करें) ।
राजा:--
मुनि लोग निर्विघ्न तपस्या वाले तो हैं न (अर्थात् मुनि लोगों की तपस्या निर्विघ्न तो चल रही है) ?
ऋषि लोग:--
सज्जनों के रक्षक आप के (विद्यमान रहने पर) धार्मिक क्रियाओं में विघ्न कैसे (हो सकता है) ? सूर्य के तपते रहने पर अन्धकार कैसे प्रकट हो सकता है ?
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