तदिदानीमापन्नसत्त्वेयं प्रतिगृह्यतां सहधर्मचरणायेति ।
गौतमी--आर्य किमपि वक्तुकामाऽस्मि। न मे वचनावसरोऽस्ति । कथमिति ।
नापेक्षितो गुरुजनोऽनया त्वया पृष्ठो न बन्धुजनः । एकैकस्य च चरिते भणामि किमेकेकम्।।
तो अब इस गर्भवती (शकुन्तला) को अपने साथ धर्माचरण के लिये ग्रहण (स्वीकार) कीजिये ।
गौतमी:--
आर्य, मैं कुछ कहने की इच्छा वाली (इच्छुक) हूँ । (यद्यपि) मेरे बोलने का अवसर नहीं है, क्योकि इस (शकुन्तला) ने (अपने) (पिता आदि) गुरुजनों की अपेक्षा नहीं की (उनसे अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं समझी) और तुमने (आपने) भी (इसके) बन्धुवान्धवों से नहीं पूछा (विवाह के विषय में इसके या अपने बन्धु-बान्धवों से बात-चीत नहीं की) । (तुम दोनो के) परस्पर के (इस) आचरण (कार्य) पर मैं (तुम दोनों में से) प्रत्येक (किसी एक) को क्या कहूँ |
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