शारद्वतः-शाङ्खरव, विरम त्वमिदानीम् । शकुन्तले, वक्तव्यमुक्तमस्माभिः । सोऽ यमत्र भवानेवमाह । दीयतामस्मै प्रत्ययप्रतिवचनम् ।
शकुन्तला- (अपवार्य) इदमवस्थान्तरे गते तादृशोऽनुरागे किं वा स्मारितेन ? आत्मेदानीं मे शोचनीय इति व्यवसितमेतत् । (प्रकाशम्) आर्यपुत्र... (इत्यधोक्ते) संशयित इदानीं परिणये नैष समुदाचारः । पौरव, न युक्तं नाम ते तथा पुनराश्रमपदे स्वभावोत्तानहदयमिमं जनं समयपूर्वं प्रतार्येद्शौरक्षरैः प्रत्याख्यातुम् ।
रजा-(कणों पिधाय) शान्तं पापम् ।
व्यचदेशमाविलयितुं किमीहसे जनमिमं च पातयितुम् । कूलङ्कषेव सिन्धुः प्रसन्नमम्भस्तरु च ।।
शारद्वत:--
शाङ्गरव, तुम अब चुप रहो । शकुन्तला, हम लोगों द्वारा कथनीय बात कह दी गयी (अर्थात् हम लोगों को जो कहना था, वह कह दिया) । ये महाराज इस प्रकार कह रहे हैं । अब तुम इन्हे विश्वसनीय (विश्वास दिलाने वाला) प्रत्युत्तर दो ।
शकुन्तला:--
(एक ओर मुंह कर) उस प्रकार के (गम्भीर प्रगाढ़) प्रेम के इस (विपरीत) अवस्था में प्राप्त हो जाने पर स्मरण कराने से क्या लाभ ? इस समय मेरी आत्मा शोचनीय (धिक्कार के योग्य) है - यह निश्चित है । (प्रकट रूप में) आर्यपुत्र - (आधा ही कहने पर) अब विवाह के सन्दिग्ध होने पर (विवाह के विषय में सन्देह होने से) यह सम्बोधन उचित नहीं है । हे पुरूवंशी राजन् , पहले आश्रमभूमि में स्वभावतः, निष्कपट (सरल) हृदय वाले इस व्यक्ति को (अर्थात् मुझे) शपथपूर्वक ठगकर (धोखे में डालकर) (अब) इस प्रकर के वचनों से उसका निराकरण करना (कथमपि) उचित नहीं है ।
राजा:--
(कानों को ठक कर) पाप शान्त हो (अर्थात् ऐसा पापयुक्त वचन मत कहो) । स्वच्छ जल को (मलिन करने वाली) और किनारों के वृक्ष को (गिराने वाली) किनारों को तोड़ती हुयी (ढहाती हुई) नदी की भांति तुम क्यो (अपने) कुल को कलङ्कित और इस व्यक्ति को (अर्थात् मुझको) पतित करना चाहती हो ।
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