अध्याय 1 — प्रथम अंक
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
31 श्लोक • केवल अनुवाद
सारथि, मारे जाते हुये इस (मृग) को देखो, (अर्थात् देखो, अब मैं इस मृग को मारता हूँ) । (ऐसा कह कर बाण चढ़ाने का अभिनय करते हैं) ।
(नेपथ्य में) हे राजन् , यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये; मत मारिये ।
सारथि:--
(सुनकर और देखकर) हे आयुष्मन् ! आप के बाण के मार्ग मे (अर्थात् बाण के लक्ष्यभूत) इस मृग के (और आप के) बीच में तपस्वी उपस्थित हो गये हैं ।
राजा:--
(घबराहट के साथ) तो घोडे रोक लिये जाये ।
सारथि:--
ठीक है । (रथ को रोकता है ) ।
(तदन्तर शिष्यों के साथ तपस्वी प्रवेश करता है )
तपस्वी:--
(हाथ उठाकर) हे राजन्, यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये, मत मारिये । इस कोमल मृग के शरीर पर रुई के ढेर पर अग्नि के समान, यह बाण न चलाइये (न छोडिये), न चलाइये (न छोडिये) । हाय ! बेचारे हरिणो का अत्यन्त चञ्चल जीवन कहाँ? और तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आप के बाण कहाँ?
(सभी ऋषि कन्याये राजा को देखकर कुछ घबरा सी जाती हैं)
अनसूया:--
आर्य, कोई भी बड़ी विपत्ति नहीं है । हमारी यह प्रियसखी (शकुन्तला) भ्रमर के द्वारा पीडित (परेशान) होती हई भयभीत हो गयी थी । (शकुन्तला को दिखाती है) ।
राजा:--
(शकुन्तला की ओर मुख करके) क्या (आप का) तप बढ़ रहा है (अर्थात् आप का तप निर्विघ्न तो चल रहा है न) ।
(शकुन्तला घबराहट के कारण चुपचाप खड़ी रहती है) ।
अनसूया:--
सम्प्रति (आप जैसे विशिष्ट) अतिथि के आगमन से (तप बढ़ रहा है) । हे सखी शकुन्तला, कुटी (उटज) में जाओ (और) फलयुक्त अर्घ (पूजन का द्रव्य) ले आओ । यह (घडे का जल) पैर धोने के लिये (पादोदक) होगा ।
राजा:--
आप लोगों की प्रिय वाणी से ही (मेरा) अतिथिसत्कार सम्पन्न हो गया।
प्रियंवदा:--
तब तो (आप) घनी छाया से शीतल, सप्तपर्ण वृक्ष के (नीचे बनी हई) वेदी (चबूतरे) पर थोड़ी देर बैठकर (अपनी) थकान को दूर कर लें ।
राजा:--
निश्चत ही आप लोग भी इस (वृक्ष-सेचन के) कार्य से थक गयी होंगी ।
अनसूया:--
सखी शकुन्तला, हम लोगो को अतिथि के पास बैठना उचित है । यहाँ (हम लोग) बेठे । (सभी बेठ जाती हैं) ।
शकुन्तला:--
(अपने मन में) क्यों इस (व्यक्ति) को देखकर तपोवन के विरोधी विकार (काम-भावना) का पात्र (लक्ष्य) हो गयी हूँ ।
राजा:--
(सबको देखकर) अहा, आप लोगों की मित्रता समान आयु और रूप के कारण रमणीय है ।
प्रियवदा:--
(हाथ की ओट कर) अनसुया, यह सुंदर और गम्भीर आकृति वाला कौन है, जो मधुर और प्रिय (वाणी) बोलता हआ प्रभावशाली-सा प्रतीत हो रहा है ।
अनसुया:-- सखी, मुझे भी यह कौतूहल (जानने की इच्छा) है । अच्छा, इनसे पूछती हूँ । (प्रकट रूप से) आपके मधुर भाषण से उत्पन्न विश्वास मुझे (आप से कुछ पूछने के लिये) प्रेरित कर रहा है । आपके द्वारा कौन-सा राजर्षिवंश अलङ्कृत किया जा रहा है (अर्थात् आप किस राजवंश में उत्पन्न हुये हैं)? किस देश के लोग आप के वियोग से व्याकुल बनाये गये हैं (अर्थात् अप कहाँ से आये हैं)? किस कारण से (आप ने) अपने अत्यन्त सुकुमार शरीर को इस तपोवन मे आने के परिश्रम का पात्र बनाया है (अर्थात् किस कारण आप इस तपोवन मे आए हैं)?
शकुन्तला:--
(अपने मन में) हृदय, अधीर मत होवो । तुम्हारे द्वारा सोचे गये (विषयो) को यह अनसूया पृछ रही है ।
राजा:--
(अपने मन मे) इस समय में अपने को किस प्रकार प्रकट करू अथवा अपने को किस प्रकार से छिपाऊं । अच्छा, इससे इस प्रकार कहता हूं । (प्रकट रूप में) आदरणीये, जो पुरुवंशोत्यत्र राजा दुष्यन्त के द्वारा धर्माधिकारी नियुक्त किया गया है, वह मैं निर्विध्न (धार्मिक) क्रियाओं को जानने के लिये इस तपोवन में आया हूं (अर्थात् राजा दुष्यन्त ने मुझे यह जानने के लिये तपोवन मे भेजा है कि यह तपस्वियों की धार्मिक क्रियाएं निर्विध्न रूप से चल रही हैं) ।
अनसूया:--
धर्म का आचरण करने वाले (तपस्वी लोग) अब सनाथ हो गये । (शकुन्तला श्रृंगार की लज्जा का अभिनय करती है) ।
दोनों सखियाँ:--
(दोनों राजा और शकुन्तला के आकार को जानकर हाथ से ओट करके) सखी शकुन्तला, यदि यहां आज पिता जी उपस्थित होते....... ।
शकुन्तला:--
तो क्या होता ?
दोनों सखियाँ:--
अपने जीवन के सर्वस्व (अर्थात् प्राणप्रिय वस्तु) (तुम शकुन्तला) से भी इस विशिष्ट अतिथि को कृतार्थं करते ।
शकुन्तला:--
तुम दोनों हट जाओ । (तुम दोनों) कुछ मन में रखकर (ऐसा) कर रही हो । तुम दोनों की बातें नहीं सुनूंगी ।
राजा:--
हम भी आप दोनों की सखी के विषय में कुछ पृूछना चाहते हैं ।
दोनो सखियाँ:--
आर्य, (आप की) प्रार्थना (हम लोगों पर) अनुग्रह के समान है ।
राजा:--
कश्यप कुल में उत्पन्न पूज्य (कण्व) शाश्वत ब्रह्मचर्य में अवस्थित हैं (अर्थात् नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं) यह प्रसिद्ध है । और आप की यह सखी (शकुन्तला) उनकी पुत्री है, यह कैसे ?
अनसुया:--
आर्य, सुनें । "कौशिक" इस गोत्र-नाम वाले कोई अत्यन्त प्रभावशाली राजर्षि हैं ।
राजा:--
हाँ, (एसा) सुना जाता है ।
अनसूया:--
उन (कौशिक) को हमारी प्रियसखी (शकुन्तला) का जन्मदाता (पिता) समझें । (माता-पिता से) परित्यक्त इसके शरीर के पालन-पोषण आदि के कारण तात कण्व इसके पिता हैं ।
राजा:--
"परित्यक्त' शब्द से मुझे जिज्ञासा (जानने की इच्छा) उत्पन्न हो गयी है । (मै इस बात को) प्रारम्भ से सुनना चाहता हूँ ।
अनसूया:--
आर्य, सुनें । पहले (पूर्वकाल में) गौतमी नदी के तट पर उग्र तपस्या में रत उस राजर्षिं से सशंकित (अर्थात् भयभीत) देवताओं ने (उनकी) तपस्या (नियम) में विघ्न करने वाली मेनका नामक अप्सरा को भेजा ।
राजा:--
दूसरों की समाधि से भयभीत होना - यह देवताओं में (पाया जाता) है ।
अनसूया:--
तत्पश्चात् वसन्तऋतु के आगमन के समय उस (मेनका) के उन्मादक रूप को देखकर ... । (आधा कहने पर लज्जा से रुक जाती है) ।
राजा:--
आगे (का वृत्तान्त) ज्ञात ही हो जाता है कि यह (शकुन्तला) सर्वथा अप्सरा से उत्पन्न है (अर्थात् अप्सरा की पुत्री है) ।
अनसूया:--
और क्या !
राजा:--
ठीक है, क्योकि मानव-स्त्रियों (मनुष्य-लोक की स्त्रियों) में इस सौन्दर्य (रूप) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है (अर्थात् नहीं हो सकती) । कान्ति से चमकती हुई बिजली (ज्योति) भूमि (भूतल) से उत्पन्न नहीं होती है ।