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अध्याय 1 — प्रथम अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
31 श्लोक • केवल अनुवाद
जो (मूर्ति) सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा) की प्रथम रचना (जलरूप मूर्ति) है। जो (अग्निमयी मूर्ति) विधिपूर्वक हवन की गयी (अग्नि में डाली गयी) हविस् को (देवताओं के पास) ले जाती है और जो हवन करने वाली (अर्थात् यजमानरूप मूर्ति) है, जो दो (सूर्य एवं चन्द्र रूपी मूर्तियाँ) समय (दिन और रात) का विधान (निर्माण) करती हैं, श्रवणेन्द्रिय (कान) के विषयभूत (शब्द रूप) गुणवाली जो (आकाशरूप मूर्ति) संसार को व्याप्त कर स्थित है, जिस (पृथिवोरूप मूर्ति) को (विद्वान) समस्त बीजों का कारण कहते हैं, (और) जिस (वायुरूप मूर्ति) से प्राणो प्राण वाले (जीवित) हैं-उन प्रत्यक्ष आठ मूर्तियों से युक्त (अष्टमूर्ति) शिव आप लोगों की रक्षा करें।
( नान्दी पाठ की समाप्ति पर) सूत्रधार (नेपथ्य की ओर देखकर):-- आर्ये, यदि नेपथ्य-कार्य (अभिनेताओं का वेशविन्यास धारण आदि कार्य) पूर्णं हो गया हो, तो इधर आओ । नटी (आती हुई):-- आर्यपुत्र, यह (मै उपस्थित) हूं। सूत्रधार:-- आर्य, यह सभा अधिक विद्वानों से युक्त (भरी) है । आज हमे कालिदास के द्वारा विरचित कथा-वस्तु वाले अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नवीन नाटक के साथ उपस्थित होना है । अतः (नाटक के) प्रत्येक पात्र के विषय में प्रयत्न किया जाना चाहिये अर्थात्‌ प्रत्येक पात्र के अभिनय पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है । नटी:-- आपके सुव्यवस्थित अभिनय के कारण कोई न्यूनता नहीं रहेगी । सूत्रधार:-- आर्ये, मेँ तुमसे यथार्थ (सच) कहता हूं । विद्रानों के सन्तोष तक (अर्थात्‌ जब तक विद्रान्‌ सन्तुष्ट न हो जाए तब तक) भी अपने अभिनयकौशल को ठीक (सफल) नहीं मानता (क्योकि) अत्यधिक शिक्षित लोगो का भी चित्त (मन) अपने ऊपर विश्चासरहित होता है (अर्थात्‌ वे अपने ज्ञान के विषय में पूर्णतः विश्वस्त नहीं हो पाते)
नटी:-- आर्य यह ऐसा ही है (अर्थात्‌ आप का कथन ठीक है) अब इसके बाद के करणीय कार्य के विषय मे आदेश दीजिये । सूत्रधारः-- इस सभा के (सदस्यो के) कानों (श्रुति) को प्रसन्न करने के अतिरिक्त ओर क्या (करना) है? इसलिये शीघ्र ही आरम्भ हुए (जलस्नानादि के द्वारा) उपभोग के योग्य इस ग्रीष्म ऋतु के विषय में (ही) गाओ । क्योकि इस समय सुखकर (अच्छा) लगता है जल में स्नान करना जिनमे, गुलाबो (पाटल) के सम्पर्क से सुगन्धित हो जाता है बन का पवन जिनमे, सघन (घनी) छाया मे सरलता से आती है नींद जिनमे, ऐसे (गर्मी के) दिन सायं काल में मनोहर (होते हैं) ।
नटी:-- (जैसा आप कह रहे है) वैसा (ही करती हूं) । (गाती है) युवतियां (सुंदरियां) दयायुक्त होकर भ्रमरों (भोरों) के द्वारा थोड़े-थोडे चूमे गये (आस्वादित) कोमल केसर-शिखा से युक्त शिरीष-पुष्पो को (अपने) कानों का आभूषण बना रही हैं ।
सूत्रधार:-- आर्य (तुमने बहुत) अच्छा गाया । अहा, राग (गान-राग) के द्वारा आकृष्ट चित्तवृत्ति (अन्तः करण) वाली नास्य-शाला (दर्शक लोग) चित्रित सी (चित्रलिखित सी) लग रही है । तो अब किस प्रकरण (नाटक) को लेकर (अर्थात्‌ किस नाटक का अभिनय करके) इस (नास्यशाला) को सन्तुष्ट (प्रसन्न) किया जाय । नटी:-- अरे पृज्य, आपके द्वारा पहले ही आदेश दिया गया था कि अभिज्ञानशाकुन्तल नामक अपूर्व (अनुपम) नाटक का अभिनय (प्रयोग) किया जाय । सूत्रधार:-- आर्ये, (तुम्हारे द्वारा) ठीक स्मरण कराया गया है (अर्थात्‌ तुमने अच्छी याद्‌ दिलायी) । इस समय मेँ (यह) भूल (ही) गया था । क्योकि आपके मनमोहक गीत ने मुझे मोहित कर लिया था। जैसे हमारे नाटक के नायक को हिरण ने मोहित कर लिया। (दोनो सूत्रधार एवं नटी मञ्च से जाते है) यहां पर प्रस्तावना समाप्त होती है।
(इसके बाद्‌ हरिण का पीछा करते हये, बाण चढ़ा हुआ धनुष हाथ मे लिये हुये राजा ओर सारथि रथ पर बैठे हुये प्रवेश करते है) । सूत:- (राजा ओर हरिण को देखकर) चिरञ्जीविन्‌, कृष्णसार हरिण और चढ़ी हुई प्रत्यंचा वाले धनुष से युक्त आप (दुष्यन्त) के ऊपर दृष्टिपात करता हुआ (मैं) मानों हरिण का पीछा करते हुये साक्षात्‌ धनुर्धारी शिव को देख रहा हूं।
राजा:-- सारथि, इस मृग के द्वारा हम लोग (बहुत) दूर खींच लाये गये है । यह (मृग) तो इस समय भी देखो, पीछे दोडते हुये (हमारे) रथ पर पुनः-पुनः गर्दन मोडकर मनोहरता से दृष्टि डालता हुआ, बाण लगने के भय के कारण (अपने) अधिकांश पिछले अर्धं भाग से अगले भाग मे सिमटा हुआ (अर्थात्‌ शरीर के पिछले भाग को अगले भाग की ओर समेटे हुये), श्रम के कारण खुले हुये मुख से अर्धचर्वित (आधे चबाये हुये) कुशो से मार्गं को व्याप्त करता हुआ, ऊची छलांग (चौकड़ी) भरने के कारण जैसे आकाश मे अधिक (और) पृथ्वी पर कम ही दौड रहा है ।
सारथि:-- चिरञ्जीविन्‌, भूमि ऊची-नीची थी, इसलिए मेने लगाम को खीच कर रथ का वेग (चाल) धीमा कर दिया था । इससे यह मृग अधिक दूरवर्ती हो गया है । अब समतल भूमि पर स्थित आप के लिए (यह) दुर्लभ नहीं होगा (अर्थात्‌ आप इसे सरलता से प्राप्त कर लेंगे)। राजा:-- तो लगाम ढीली कर दो। सारथि:-- जो आप की आज्ञा । (रथ वेग का अभिनय कर) चिरञ्जीविन्‌, देखिये-देखिये लगाम को ढीली कर दिये जाने पर ये रथ के घोड़े मानों हरिण के वेग को सहन न कर सकने के कारण शरीर के आगे के भाग को फेलाये हुये, (शिर पर विद्यमान) कलंगी (चमर) के निश्चल अग्रभाग (शिखा) से युक्त, निश्चेष्ट तथा ऊपर उठे हुये कानों वाले, अपने (पैरो के) द्वारा उठायी (उडायी) गयी धूल से भी अलङ्घनीय (होकर) दौडे रहे हें ।
राजा:-- सच है । (ये) घोड़े सूर्य और इन्द्र के घोड़ों का भी (वेग में) अतिक्रमण कर रहे हैं (अर्थात्‌ इन घोड़ों ने सूर्यं तथा इंद्र के घोड़ो को भी परास्त कर दिया है ।) क्योकि रथ के वेग के कारण जो (वस्तु दूर से) देखने मे छोटी (दिखायी पडती है), वह अकस्मात्‌ विशालता को प्राप्त हो जाती है (अर्थात्‌ बड़ी जो जाती है ) । जो (वृक्षादि वस्तु) वस्तुतः विभक्त (कटी हुई पृथक्‌ प्रथक्‌ है), वह जुडी हुई सी (मिली हुई सी) (प्रतीत) होती है । जो (वस्तु) स्वभावतः टेडी है, वह भी ओंखो के लिये सीधी-सी (हो जाती है ।) (सम्प्रति) क्षण भर के लिये भी कोई (वस्तु) न मुञ्जसे दूर है और न पास है ।
सारथि, मारे जाते हुये इस (मृग) को देखो, (अर्थात्‌ देखो, अब मैं इस मृग को मारता हूँ) । (ऐसा कह कर बाण चढ़ाने का अभिनय करते हैं) । (नेपथ्य में) हे राजन्‌ , यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये; मत मारिये । सारथि:-- (सुनकर और देखकर) हे आयुष्मन्‌ ! आप के बाण के मार्ग मे (अर्थात्‌ बाण के लक्ष्यभूत) इस मृग के (और आप के) बीच में तपस्वी उपस्थित हो गये हैं । राजा:-- (घबराहट के साथ) तो घोडे रोक लिये जाये । सारथि:-- ठीक है । (रथ को रोकता है ) । (तदन्तर शिष्यों के साथ तपस्वी प्रवेश करता है ) तपस्वी:-- (हाथ उठाकर) हे राजन्‌, यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये, मत मारिये । इस कोमल मृग के शरीर पर रुई के ढेर पर अग्नि के समान, यह बाण न चलाइये (न छोडिये), न चलाइये (न छोडिये) । हाय ! बेचारे हरिणो का अत्यन्त चञ्चल जीवन कहाँ? और तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आप के बाण कहाँ?
इसलिये (राजन्‌ !) धनुष पर अच्छी प्रकार चढ़ाये गये बाण को उतार लीजिये । आप का शस्त्र पीड़ितों की रक्षा के लिये (है), निरपराध पर प्रहार करने के लिये नहीं (है) ।
राजा:-- यह (बाण धनुष पर से) उतार लिया गया है । (राजा कथनानुसार करते हैं अर्थात्‌ बाण को धनुष से उतार लेते हैं ) तपस्वी:-- पुरुवंश के दीपक आप के लिये यह उचित ही है । जिसका पुरु के वंश में जन्म (हुआ है), (उस) आपके लिये यह (तपस्वी के कहने से बाण को धनुष से उतारना) अत्यन्त उचित है । (आप) इसी प्रकार के गुणों से युक्त चक्रवर्ती पुत्र को प्राप्त करें ।
अन्य दोनों (तपस्वी):-- (अपने-अपने हाथों को उठाकर कहते हैं) अवश्य ही चक्रवती पुत्र को प्राप्त करें । राजा:-- (प्रणाम पुर्वक) (आप ब्राह्मणों का वचन मैंने) स्वीकार कर लिया । तपस्वी:-- हे राजन्‌, हम लोग समिधा लाने के लिये निकले हुए हैं । यह (सामने) मालिनी नदी के तट पर कुलपति कण्व का आश्रम दिखायी पड़ रहा है । यदि (आपके) अन्य कार्य में विलम्ब (अतिपात) न हो तो (आश्रम में) प्रवेश कर (अर्थात्‌ आश्रम में जाकर) अतिथिजनों के योग्य सत्कार को स्वीकार कीजिये । और भी तपस्वियो की निर्विघ्न (विघ्नो रहित) रमणीय (यज्ञादि) क्रियाओं को सम्यक्‌ देखकर, धनुष की डोरी की रगड़ से उत्पन्न चिन्ह के द्वारा अलडकृत मेरी भुजा (प्रजा की) कितनी रक्षा करती हैं, यह (आप) जान लेंगे ।
राजा:-- क्या कुलपति यहाँ (आश्रम में) विद्यमान हैं ? तपस्वी:-- अभी ही (अपनी) पुत्री शकुन्तला को अतिथि-सत्कार के लिये नियुक्त करके इसके (शकुन्तला के) प्रतिकूल भाग्य को शान्त करने के लिये सोमतीर्थं गये हैं । राजा:-- अच्छा, उसी (कुलपति की पुत्री) का ही दर्शन करुंगा । वह मेरी (महर्षि कण्व के प्रति) भक्ति को जानकर महर्षि (कण्व) से कहेंगी । तपस्वी:-- अच्छा, हम जाते हैं । (शिष्यों के साथ निकल जाता है) राजा:-- सारथि, अश्वो को हांको । पवित्र आश्रम के दर्शन से अपने को पवित्र करें । सारथि:-- आयुष्मन्‌ ! जैसी आप की आज्ञा (वह पुनः रथ के वेग का अभिनय करता है )। राजा:-- (चारो ओर देखकर) सारथि, बिना कहे भी ज्ञात ही हो रहा है कि यह तपोवन की सीमा (आभोग) है । सारथि:-- कैसे ? राजा:-- क्या आप नहीं देखते हैं । क्योकि यहां (कहीं पर) वृक्षों के नीचे तोतो से युक्त कोटरो के द्वार से गिरे हुए नीवार (जङ्गली धान) (दिखायी पड़ रहे हैं) । कहीं पर इङ्कदी के फलों को तोडने वाले चिकने पत्थर दृष्टिगोचर हो रहे हैं । (कहीं पर) विश्वास उत्पन्न हो जाने के कारण निःशङ्क (निर्भय) गति वाले हरिण (रथ की) ध्वनि (घरघराहट) को सहन कर रहे हैं (अर्थात्‌ भय से इधर-उधर नहीं भाग रहे हैं) । और (कहीं पर) जलाशयो (सरोवर) की ओर जाने वाले मार्ग वल्कलवस्त्रो के छोर से टपकने वाले (जल की) रेखा से चिहित (दिखायी दे रहे हैं) ।
वायु के द्वारा चञ्चल, सिचाई की नालियों के जलों से वृक्षों की जड़ें घुली गयी हैं। घृत के धूम (धुएँ) के उठने से किसलयों (कोमल पत्तों) की कान्ति की लालिमा नष्ट हो गयी है और ये निर्भीक हरिणों के बच्चे काटे गये (तोड़े गये) कुशों के अङ्कुर वाली उद्यान भूमि पर समीप में ही धीरे-धीरे विचरण कर रहे हैं । सारथि:-- (आपने जो कुछ कहा है वह) सब ठीक है । राजा:-- (थोड़ी दूर जाकर्‌) तपोवन के निवासियों को (किसी प्रकार का) विघ्न न होने पाये । इसलिये यहाँ ही रथ को रोको, जब तक मैं उतरता हूं । सारथि:-- (मैने) लगाम खीच ली है । श्रीमान्‌ (आयुष्मान्‌) उतरें । राजा:-- (उतरकर) सारथि, तपोवनों (आश्रमों) में सादे वेष से ही प्रवेश करना चाहिये। तो यह लो (सारथि को आभूषण और धनुष उत्तार कर देते हैं)। सारथि, जब तक मैं आश्रमवासियों को देखकर लौटता हूँ तब तक घोड़े भींगी पीठ वाले किये जायें (अर्थात् घोड़ों को स्नान करा दो)। सारथि:-- वैसा ही (होगा) । (निकल जाता है) । राजा:-- (घूमकर और देखकर) यह आश्रम का (प्रवेश) द्वार है । अच्छा, प्रवेश करता हूँ (प्रवेश कर शकुन को सूचित करते हुए) यह आश्रम का स्थान शान्त है और (मेरी दाहिनी) भुजा फड़क रही है । यहाँ इस (दाहिनी भुजा के फड़कने) का फल कहाँ (प्राप्त हो सकता है)? अथवा भावी (होनहार) घटनाओं के द्वार (मार्ग) सभी स्थानों पर (सुलभ) हो जाते हैं।
राजा:-- (कान लगाकर) अरे, वृक्षों की वाटिका के दाहिनी ओर से वार्तालाप-सा सुनायी पड़ रहा है। तो यहाँ जाता हूँ। (घूमकर और देखकर) अरे, ये तपस्वियों की कन्यायें अपने आकार (सामर्थ्य) के अनुसार सिंचाई के (छोटे-छोटे) पड़ों से छोटे पेड़ों को पानी देने के लिये इधर ही आ रही हैं। (ध्यान से देखकर) अहो, इनका रूप (अत्यन्त) मनोहर है। अन्तःपुर (रनिवास) में दुर्लभ यह शरीर (लावण्य) यदि आश्रमवासी व्यक्ति का (है, तो) निश्चय ही उपवन की लतायें बन (जाल) की लताओं से (सौन्दर्यादि) गुणों के द्वारा तिरस्कृत कर दी गयी हैं (अर्थात् जङ्गल की लताओं ने अपने गुणों से उपबन की लताओं को परास्त कर दिया है)।
तो इस (पेड़ की) छाया का आश्रय लेकर प्रतीक्षा करता हूँ (देखता हुआ खड़ा हो जाता है) । (तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त कार्य करती हुई दो सखियों के साथ शकुन्तला प्रवेश करती है) । शकुन्तला:-- सखियों, इधर से, इधर से (आओ) । अनसुया:-- अरी शकुन्तला, मैं ऐसा सोचती हूँ पिता कण्व (काश्यप) को आश्रम के वृक्ष तुमसे भी अधिक प्रिय है। इसीलिये चमेली (नवमालिका) के पुष्प जैसी कोमल (होने पर) भी तुम (उनके द्वारा) इन (वृक्षों) के घाले (आलवाल) भरने (के कार्य) में नियुक्त की गयी हो । शकुन्तला:-- केवल पिता (कण्व) की आज्ञा ही नहीं है, मेरा भी इन (वृक्षों) पर सगे भाई के समान प्रेम है (वृक्षों के सींचने का अभिनय करती है।) राजा:-- क्या यही वह कण्व की पुत्री (शकुन्तला) है ? (जिसके विषय में मैने तपस्वी से सुना था) पूजनीय कण्व निश्चय ही (वस्तुओं का) ठीक मूल्याङ्कन करने वाले नहीं हैं (अर्थात्अ विवेकी है), जिन्होंने इस (शकुन्तला) को आश्रम के कार्यों में नियुक्त किया है। जो ऋषि (कण्व) सहज सुन्दर (किसी कृत्रिम साधन के बिना सुन्दर) (शकुन्तला के) इस शरीर को, तपस्या करने के योग्य बनाना चाहते हैं, वे निश्चय ही नील-कमल के पत्ते की धार (अग्र भाग) से शमी (वृक्ष) की लता को काटने का प्रयत्न कर रहे हैं।
अच्छा, वृक्ष की ओट (आड़) में ही रहकर निश्चिन्ततापूर्वक इस (शकुन्तला) को देखता हूँ। (वैसा करता है) । शकुन्तला:-- सखी अनसूया, प्रियंवदा के द्वारा अत्यन्त कसकर बाँधे गये वल्कल (वृक्ष की छाल की चोली) से जकड़ दी गयी हूँ। जरा इसको ढीला कर दो। अनसूया:-- अच्छा। (ढीला करती है)। प्रियंवदा:-- (परिहास के साथ) यहाँ (इसके लिये) स्तनों का विस्तार करने वाले अपने यौवन को उलाहना दो। मुझे क्यों उलाहना दे रही हो ? राजा:-- इसने ठीक कहा। कंधे पर लगायी गयी छोटी गाँठ वाले (और) स्तनों के विस्तार को ढक देने बाले वल्कल-वन से इस (शकुन्तला) का यह नवीन (अर्थात् यौवनयुक्त) शरीर, पीले पत्तों के मध्य-भाग से ढके हुए पुष्प के समान अपनी शोभा को पुष्ट (धारण) नहीं कर रहा है।
अथवा भले ही (यह) वल्कल-वस्त्र इस (शकुन्तला) के शरीर के योग्य (अनुरूप) नहीं है । (तथापि यह शकुन्तला के इस शरीर पर) आभूषण की शोभा को धारण नहीं कर रहा है, ऐसी बात नहीं (अर्थात् अलङ्कार की शोभा को धारण कर रहा है)। क्योंकि सेवार (शेवाल) से आच्छादित (घिरा हुआ) भी कमल रमणीय (लगता है)। मलिन (काला) कलङ्क भी चन्द्रमा की शोभा को बढ़ाता है। वल्कल-वस्त्र से भी यह कृशाङ्गी (शकुन्तला) अत्यन्त सुन्दर (लग रही है)। क्योंकि सुन्दर (रम्य) आकृतियों (शरीरों) के लिये कौन-सी वस्तु अलङ्कार नहीं होती है (अर्थात् सभी वस्तुयें शोभावर्धक बन जाती हैं)।
शकुन्तला:-- (आगे की ओर देखकर) यह केसर (मौलश्री) वृक्ष वायु के द्वारा हिलायी जाती हुईं पत्ते रूपी अङ्गुलियों से मानों मुझको (अपने पास आने के लिये) शीघ्रता करा रहा है (अर्थात् मुझको शीघ्रता से अपने पास बुला रहा है)। तो मैं (सबसे पहले) इसका (जल-सेचन द्वारा) सत्कार करती हूँ। (घूमती है)। प्रियंवदा:-- सखी शकुन्तला, क्षण भर (थोड़ी देर) यहीं ठहरो। शकुन्तला:-- किस लिये ? प्रियंवदा:-- क्योंकि तुम्हारे द्वारा समीपस्थ (अर्थात् तुम्हारे समीप रहने से) यह मौलश्री (केसर) का वृक्ष लता (रूप स्त्री) से युक्त-सा प्रतीत हो रहा है। शकुन्तला:-- इसीलिये तुम प्रियंवदा (प्रिय बोलने वाली कही जाती) हो। राजा:-- प्रियंवदा ने शकुन्तला से प्रिय होने पर भी सच बात कही है। निश्चय ही इस (शकुन्तला) का अधरोष्ठ (नीचे का ओंठ) नवपल्लव (नये पत्ते) के समान लाल (है), भुजाएँ कोमल शाखाओं (डालियों) के सदृश है (और इसके) अंगों में पुष्प की भांति लुभावना (मनोहर) यौवन व्याप्त (है)।
अनसूया:-- सखी शकुन्तला, यह आग्रवृक्ष (सहकार) की स्वयंवर-वधु (अपने आप वरण करने वाली वधू) नवमालिका है जिसका तुम्हारे द्वारा वनज्योत्स्ना (वन की चांदनी) नाम रखा गया हे । (क्या) इसको भूल गयी हो ? शकुन्तला:-- तब तो अपने को भी भूल जाऊंगी । (लता के समीप जाकर और देखकर) सखी, अत्यन्त सुन्दर समय में लता और वृक्ष के इस जोड़े का मिलन (व्यतिकर) हआ है । वनज्योत्स्ना नवीन पुष्परूपी यौवन से संवलित और आगप्रवृक्ष पत्तो से युक्त होने के कारण (इसका) उपभोग करने में समर्थ है । (देखती हई खड़ी हो जाती है) । प्रियवदा:-- अनसूया, (क्या तुम यह) जानती हो कि शकुन्तला किसलिये वनज्योत्स्ना को बहुत अधिक देख रही है ? अनसूया:-- नहीं जान पा रही हूँ । (तुम्हीं) बताओ । प्रियंवदा:-- जिस प्रकार वनज्योत्स्ना (अपने) अनुरूप (योग्य) वृक्ष से मिल गयी है (अर्थात्‌ अपने योग्य (वररूप) वृक्ष की जीवनसंगिनी बन गयी है), (उसी प्रकार) क्या मैं भी अपने योग्य (अनुरूप) वर को पाऊंगी ? शकुन्तला:-- यह निश्चय ही तुम्हारी अपनी अभिलाषा है (घडे को उड़लती है) । राजा:-- क्या यह सम्भव है कि यह (शकुन्तला) कुलपति (कण्व) की असवर्ण (ब्राह्मणेतर) पत्नी (क्षत्र) से उत्पन्न हुई हो ? अथवा सन्देह करने की आवश्यकता नहीं । (यह शकुन्तला) निः सन्देह क्षत्रिय के द्वारा पत्नी के रूप में ग्रहण करने योग्य (विवाह करने के योग्य) है, जिससे कि मेरा श्रेष्ठ मन इस (शकुन्तला) में अभिलाषा से युक्त (है) (अर्थात्‌ इसे चाहता है) । क्योकि सन्देहास्पद वस्तुओं (विषयो) मे सज्जनो के अन्तःकरण की प्रवृत्तियों (आत्मा की आवाज) ही प्रमाण (निर्णायक होती है) ।
फिर भी यथार्थ रूप से इस (शकुन्तला) का पता लगाऊगा । शकुन्तला:-- (घनराहट के साथ) ओह, जल के सींचने से घबड़ाकर (ऊपर) उड़ा हुआ (यह) भौंरा चमेली (नवमालिका) को छोडकर मेरे मुख की ओर आ रहा है । (भौंरे से पीडा का अभिनय करती है) । राजा:-- (अभिलाषा के साथ देख कर) हे भ्रमर, (तुम शकुन्तला की) चञ्चल नेत्र प्रान्त (अपाङ्ग) वाली तथा कांपती हई दृष्टि (नेत्रो को) बार-बार स्पर्श कर रहे हो । रहस्य की बात (गुप्त बात) कहने वाले की भाँति कान के समीप विचरण करते हुए मधुर-मधुर गुञ्जन कर रहे हो । (मना करने के लिये) हाथो को हिलाती हुई (इस शकुन्तला) के प्रेम (रतिक्रीडा) के सर्वस्व (भूत) अधर को पी रहे हो । हम (राजा दुष्यन्त) (तो) तथ्य के अन्वेषण (खोज) मे (ही) मारे गये, तुम तो निश्चय ही कृतार्थं (सफल) हो गये ।
शकुन्तला:-- यह ढीठ (भ्रमर) नहीं रुक रहा हैं । दूसरी ओर जाती हूँ । (कुछ पग चलने के पश्चात्‌ रुककर, -दृष्टिपात करती हुई) क्या इधर भी आ रहा है । सखी, इस दुष्ट भ्रमर से पीडित की जाती हुई मुञ्चको बचाओ । दोनो:-- (मुस्कराकर) हम दोनो (तुम्हे) बचाने वाली कौन हैँ । (राजा) दुष्यन्त को पुकारो । (क्योकि) तपोवन राजा के द्वारा रक्षणीय होते हैं । राजा:-- यह अपने को प्रकट करने का (उचित) अवसर है । मत डरो, मत डरो (ऐसा आधा कहकर अपने मन मे) किन्तु (इससे मेरा) राजत्व (राजा होना) परिज्ञात हो जायेगा । अच्छा, तो इस प्रकार कहूँगा । शकून्तला:-- (कुछ पग चलने के पञ्चात्‌ रुककर दृष्टिपात करती हई) क्या इधर भी (यह) मेरा पीछा कर रहा है । राजा:-- (शीघ्र आगे बढ़कर) दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) पुरुवंशी राजा दुष्यन्त के पृथ्वी (भूमण्डल) का शासन करते हए कोन यह भोली-भाली तपस्विकन्याओं के साथ अशिष्टता का व्यवहार (आचरण) कर रहा है ?
(सभी ऋषि कन्याये राजा को देखकर कुछ घबरा सी जाती हैं) अनसूया:-- आर्य, कोई भी बड़ी विपत्ति नहीं है । हमारी यह प्रियसखी (शकुन्तला) भ्रमर के द्वारा पीडित (परेशान) होती हई भयभीत हो गयी थी । (शकुन्तला को दिखाती है) । राजा:-- (शकुन्तला की ओर मुख करके) क्या (आप का) तप बढ़ रहा है (अर्थात्‌ आप का तप निर्विघ्न तो चल रहा है न) । (शकुन्तला घबराहट के कारण चुपचाप खड़ी रहती है) । अनसूया:-- सम्प्रति (आप जैसे विशिष्ट) अतिथि के आगमन से (तप बढ़ रहा है) । हे सखी शकुन्तला, कुटी (उटज) में जाओ (और) फलयुक्त अर्घ (पूजन का द्रव्य) ले आओ । यह (घडे का जल) पैर धोने के लिये (पादोदक) होगा । राजा:-- आप लोगों की प्रिय वाणी से ही (मेरा) अतिथिसत्कार सम्पन्न हो गया। प्रियंवदा:-- तब तो (आप) घनी छाया से शीतल, सप्तपर्ण वृक्ष के (नीचे बनी हई) वेदी (चबूतरे) पर थोड़ी देर बैठकर (अपनी) थकान को दूर कर लें । राजा:-- निश्चत ही आप लोग भी इस (वृक्ष-सेचन के) कार्य से थक गयी होंगी । अनसूया:-- सखी शकुन्तला, हम लोगो को अतिथि के पास बैठना उचित है । यहाँ (हम लोग) बेठे । (सभी बेठ जाती हैं) । शकुन्तला:-- (अपने मन में) क्यों इस (व्यक्ति) को देखकर तपोवन के विरोधी विकार (काम-भावना) का पात्र (लक्ष्य) हो गयी हूँ । राजा:-- (सबको देखकर) अहा, आप लोगों की मित्रता समान आयु और रूप के कारण रमणीय है । प्रियवदा:-- (हाथ की ओट कर) अनसुया, यह सुंदर और गम्भीर आकृति वाला कौन है, जो मधुर और प्रिय (वाणी) बोलता हआ प्रभावशाली-सा प्रतीत हो रहा है । अनसुया:-- सखी, मुझे भी यह कौतूहल (जानने की इच्छा) है । अच्छा, इनसे पूछती हूँ । (प्रकट रूप से) आपके मधुर भाषण से उत्पन्न विश्वास मुझे (आप से कुछ पूछने के लिये) प्रेरित कर रहा है । आपके द्वारा कौन-सा राजर्षिवंश अलङ्कृत किया जा रहा है (अर्थात्‌ आप किस राजवंश में उत्पन्न हुये हैं)? किस देश के लोग आप के वियोग से व्याकुल बनाये गये हैं (अर्थात्‌ अप कहाँ से आये हैं)? किस कारण से (आप ने) अपने अत्यन्त सुकुमार शरीर को इस तपोवन मे आने के परिश्रम का पात्र बनाया है (अर्थात्‌ किस कारण आप इस तपोवन मे आए हैं)? शकुन्तला:-- (अपने मन में) हृदय, अधीर मत होवो । तुम्हारे द्वारा सोचे गये (विषयो) को यह अनसूया पृछ रही है । राजा:-- (अपने मन मे) इस समय में अपने को किस प्रकार प्रकट करू अथवा अपने को किस प्रकार से छिपाऊं । अच्छा, इससे इस प्रकार कहता हूं । (प्रकट रूप में) आदरणीये, जो पुरुवंशोत्यत्र राजा दुष्यन्त के द्वारा धर्माधिकारी नियुक्त किया गया है, वह मैं निर्विध्न (धार्मिक) क्रियाओं को जानने के लिये इस तपोवन में आया हूं (अर्थात्‌ राजा दुष्यन्त ने मुझे यह जानने के लिये तपोवन मे भेजा है कि यह तपस्वियों की धार्मिक क्रियाएं निर्विध्न रूप से चल रही हैं) । अनसूया:-- धर्म का आचरण करने वाले (तपस्वी लोग) अब सनाथ हो गये । (शकुन्तला श्रृंगार की लज्जा का अभिनय करती है) । दोनों सखियाँ:-- (दोनों राजा और शकुन्तला के आकार को जानकर हाथ से ओट करके) सखी शकुन्तला, यदि यहां आज पिता जी उपस्थित होते....... । शकुन्तला:-- तो क्या होता ? दोनों सखियाँ:-- अपने जीवन के सर्वस्व (अर्थात्‌ प्राणप्रिय वस्तु) (तुम शकुन्तला) से भी इस विशिष्ट अतिथि को कृतार्थं करते । शकुन्तला:-- तुम दोनों हट जाओ । (तुम दोनों) कुछ मन में रखकर (ऐसा) कर रही हो । तुम दोनों की बातें नहीं सुनूंगी । राजा:-- हम भी आप दोनों की सखी के विषय में कुछ पृूछना चाहते हैं । दोनो सखियाँ:-- आर्य, (आप की) प्रार्थना (हम लोगों पर) अनुग्रह के समान है । राजा:-- कश्यप कुल में उत्पन्न पूज्य (कण्व) शाश्वत ब्रह्मचर्य में अवस्थित हैं (अर्थात्‌ नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं) यह प्रसिद्ध है । और आप की यह सखी (शकुन्तला) उनकी पुत्री है, यह कैसे ? अनसुया:-- आर्य, सुनें । "कौशिक" इस गोत्र-नाम वाले कोई अत्यन्त प्रभावशाली राजर्षि हैं । राजा:-- हाँ, (एसा) सुना जाता है । अनसूया:-- उन (कौशिक) को हमारी प्रियसखी (शकुन्तला) का जन्मदाता (पिता) समझें । (माता-पिता से) परित्यक्त इसके शरीर के पालन-पोषण आदि के कारण तात कण्व इसके पिता हैं । राजा:-- "परित्यक्त' शब्द से मुझे जिज्ञासा (जानने की इच्छा) उत्पन्न हो गयी है । (मै इस बात को) प्रारम्भ से सुनना चाहता हूँ । अनसूया:-- आर्य, सुनें । पहले (पूर्वकाल में) गौतमी नदी के तट पर उग्र तपस्या में रत उस राजर्षिं से सशंकित (अर्थात्‌ भयभीत) देवताओं ने (उनकी) तपस्या (नियम) में विघ्न करने वाली मेनका नामक अप्सरा को भेजा । राजा:-- दूसरों की समाधि से भयभीत होना - यह देवताओं में (पाया जाता) है । अनसूया:-- तत्पश्चात्‌ वसन्तऋतु के आगमन के समय उस (मेनका) के उन्मादक रूप को देखकर ... । (आधा कहने पर लज्जा से रुक जाती है) । राजा:-- आगे (का वृत्तान्त) ज्ञात ही हो जाता है कि यह (शकुन्तला) सर्वथा अप्सरा से उत्पन्न है (अर्थात्‌ अप्सरा की पुत्री है) । अनसूया:-- और क्या ! राजा:-- ठीक है, क्योकि मानव-स्त्रियों (मनुष्य-लोक की स्त्रियों) में इस सौन्दर्य (रूप) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है (अर्थात्‌ नहीं हो सकती) । कान्ति से चमकती हुई बिजली (ज्योति) भूमि (भूतल) से उत्पन्न नहीं होती है ।
(शकुन्तला नीचे मुख करके बैठी रहती है ।) राजा:-- (अपने मन में) मेरे मनोरथ को (पूर्ण होने का) अवसर प्राप्त हो गया । किन्तु सखी के द्वारा हंसी (परिहास) मे कहीं गयी पति (वर) की प्रार्थना को सुनकर मेरा मन दुविधा में होने के कारण व्याकुल (कातर) हो रहा है । प्रियंवदा:-- (मुस्कराहट के साथ शकुन्तला को देखकर नायक की ओर मुंह कर) सम्भवतः आर्य फिर कुछ कहना चाहते हैं (शकुन्तला सखी को उंगली से झिडकती है) । राजा:-- आपने ठीक समझा । सच्चरित सुनने के लोभ से हमे ओर भी पूछना है । प्रियंवदा:-- (आप) कुछ (भी) विचार करे । तपस्वी लोग अप्रतिबन्ध प्रश्न वाले होते हैं (अर्थात्‌ तपस्वी लोगो से कोई भी प्रश्न निसंकोच पुछा जा सकता है) । राजा:-- तुम्हारी सखी के विषय में यह जानना चाहता हूँ । क्या इस (शकुन्तला) के द्वारा कामदेव (प्रेम) के क्रियाकलापों को रोकने वाला तपस्वियों का व्रत (ब्रह्मचर्य व्रत) विवाह होने तक (ही) सेवित (पालन) किया जायेगा ? अथवा यह (ब्रह्मचारिणी के रूप मे) समान नेत्र होने के कारण प्रिय हरिणियो के साथ ही जीवनपर्यन्त निवास करेगी ?
प्रियंवदा:-- आर्य, धर्माचरण में भी यह व्यक्ति (शकुन्तला) पराधीन है । फिर भी पिता कण्व (गुरु) का इसे योग्य वर को देने का (विचार) है । राजा:-- (अपने मन में) (निश्चय ही मेरी) यह (शकुन्तला प्रतिरूप) अभिलाषा (प्रार्थना), हे हृदय, अब (शकुन्तला के प्रति) अभिलाषा से युक्त हो जाओ । अब सन्देह का निर्णय हो गया । जिसको तुम अग्नि समझ रहे थे वह यह स्पर्श के योग्य रत्न है।
शकुन्तला:-- (रुष्ट-सी होकर) अनसूया, मैं चली जाऊगी । अनसूया:-- किसलिये ? शकुन्तला:-- असम्बद्ध-प्रलाप (अनर्गल प्रलाप) करने वाली इस प्रियंवदा को आर्या गौतमी से कहूंगी (अर्थात्‌ आर्या गौतमी से जाकर प्रियंवदा की शिकायत करूगी) । अनसूया:-- सखि, असत्कृत (जिसका सत्कार नहीं किया गया है ऐसे) विशिष्ट अतिधि को छोडकर स्वच्छन्दतापूर्वक चला जाना उचित नहीं है । (शकुन्तला बिना कुछ कहे ही चल पड़ती है) राजा:-- (शकुन्तला को पकड़ने की इच्छा करता हुआ (भी) अपने को रोककर । अपने मन में) अहो, कामी-जनों (प्रेमियों) की मनोवृत्ति (उसकी) चेष्टाओं के अनुकूल (हुआ करती है) क्योकि मैं मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के पीछे जाने (पीछा करने) की इच्छा करता हुआ सहसा शिष्टतावशात्‌ अवरुद्ध (रोकी हुई) गति वाला (मैं अपने) स्थान से उठकर न चलने पर भी मानो जाकर फिर लौट आया (हूँ) ।
प्रियंवदा:-- (शकुन्तला को रोककर) सखी, तुम्हारा जाना ठीक नहीं है । शकुन्तला:-- (भोंह टेडी करके) किस लिये ? प्रियंवदा:-- वृक्ष सींचने (के कार्य) में तुम दो (वृक्षो को सींचने) की मेरी ऋणी हो (अर्थात्‌ मैने तुम्हारे हिस्से के दो वृक्षो को सींचा था, अब तुम्हे मेरे हिस्से के दो वृक्षो को सींचना है ) तो चलो पहले अपने को (ऋण से) मुक्त कराकर तब जाना । (यह कहकर बलपूर्वक इसको लौटाती है) । राजा:-- भद्रे, वृक्षसेचन के कारण ही इन आदरणीया (शकुन्तला) को थकी हुई देख रहा हूँ । क्योकि इनकी, घडे को उठाने से (इसकी) (दोनों) भुजायें झुके हुए कांधो वाली और अत्यधिक लाल हथेली वाली (हो गयी हैं) । निश्चित मात्रा से अधिक चलने वाला श्वास वायु (सांस) अब भी स्तनों मे कम्पन उत्पन कर रहा है । मुख पर (कपोल पर), कर्णाभूषण रूप शिरीष (शिरस) के पुष्पों को रोकने वाले (अर्थात्‌ चिपकाने वाले) पसीने की बूंदो का समूह व्याप्त है और केशबन्धन के शिथिल हो जाने पर (खुल जाने पर) एक हाथ से संभाले गये बाल बिखरे हुए हैं ।
तो मै इनको ऋणमुक्त करता हूं । (अंगूठी देना चाहता है) । (दोनों नामांकित अंगूठी के अक्षरो को पढ़कर, एक दूसरे को देखने लगती हैं) । राजा:-- हमें और कुछ (अर्थात्‌ दुष्यन्त राजा) न समझें । यह राजा का उपहार (परिग्रह) है । प्रियंवदा:-- तो यह अँगूठी (आप की) उंगली के वियोग के योग्य नहीं है । आपके कहने से (ही) यह (शकुन्तला) अब ऋणमुक्त हो गयी है । (कुछ हंसकर) सखी शकुन्तला, तुम (इन) दयालु आर्य अथवा महाराज के द्वारा मुक्त करा दी गयी हो । अब जाओ (जा सकती हो) । शकुन्तला:-- (अपने मन में) यदि अपने वश में होऊंगी (तब तो जाऊंगी) । (प्रकट रूप में) तुम (मुझे) छोड़ने या रोकने वाली कौन हो ? राजा:-- (शकुन्तला को देखकर अपने मन में) क्या जिस प्रकार हम इस पर (साभिलाष, अनुरक्त हैं) उसी प्रकार यह भी हमारे प्रति (अनुरक्त) हैं अथवा मेरी अभिलाषा को अवसर प्राप्त हो गया है (अर्थात्‌ मेरी इच्छा के पूर्ण होने के लक्षण दिखायी दे रहे हैं) । क्योकि यद्यपि (यह शकुन्तला) मेरी बातों से अपनी बात नहीं मिलाती है (अर्थात्‌ मेरे साथ बात नहीं करती है); (तथापि) मेरे बोलने पर मेरी ओर कान लगाये रखती है । भले ही (यह) मेरे मुख की ओर मुख कर नहीं रहती है, (तथापि) इसकी दृष्टि प्रायः अन्य विषयो (वस्तुओं) की ओर नहीं (रहती है) अर्थात्‌, मेरे अतिरिक्त किसी दूसरे की ओर नहीं जाती है ।
(नेपथ्य में) हे हे तपस्वियो, तपोवन के प्राणियों (सत्त्वो) की रक्षा के लिये आप लोग (उन प्राणियों के) समीपवर्ती हो जाइये । शिकार के लिये विचरण करने वाला राजा दुष्यन्त (आश्रम के) पास में आ गया है । क्योकि घोड़ों के खुरो से उठायी (उड़ायी) गयी सायंकालीन (अर्थात्‌ अस्त होते हुये) सूर्य की कान्ति के तुल्य (लाल) कान्ति वाली धूल पतद्गों के समूह (टिड्डियों के दल) की भाँति आश्रम के (उन) वृक्षों पर गिर रही (पड़ रही) है, जिनकी शाखाओं (डालियों) पर मुनियों के जल से गीले वल्कलवसख (सुखने के लिये) डाले गये (फैलाये गये) हैं । रथ को देखने से भयभीत, तीत्र (कठोर) प्रहार से सामने के वृक्ष की शाखा (डाली) में टूटे हुये एक दांत वाला, पैरो से खीचे गये लतासमूह के लिपटने से (पैर मे) पड़ी हुयी बेड़ी वाला तथा हरिणसमूह को छिन्न-भिन्न (तितर-बितर) कर देनेवाला (यह) हाथी हम लोगों की तपस्या के शरीरधारी विध्न की भाँति तपोवन में प्रवेश कर रहा है ।
[ सभी (मुनिकन्याये) कान लगाकर (अर्थात्‌ सुनकर) कुछ घबरा सी जाती हैं ] राजा:-- (अपने मन में) ओह, धिक्कार है । नगरवासी मुझे खोजते हुए तपोवन को घेर रहे हैं । अच्छा, तो मैं लौट जाता हूँ । दोनों सखियाँ:-- आर्य, हम लोग इस जङ्गली हाथी (आरण्यक) के वृत्तान्त से घबरा गयी हैं । हमें कुटी (उटज) पर जाने की अनुमति दीजिये । राजा:-- (घबराहट के साथ) आप लोग जाइये । हम भी ऐसा प्रयत्न करेंगे, जिससे आश्रम.को कष्ट न हो । (सभी लोग उठ जाते हैं) । दोनों सखियाँ:-- आर्य, आपका अतिथि-सत्कार नहीं किया जा सका - ऐसे आप से पुनः दर्शन देने के लिये निवेदन करने में हम लोग लज्जित हो रही हैं । राजा:-- नही, ऐसा न (कहिये) । आप लोगो के दर्शन से ही मैं सत्कृत हो गया हूँ । शकुन्तला:-- अनसूया, नये कुशो की नोक से मेरा पैर क्षत (घायल) हो गया है और मेरा वल्कलवस्र कुरबक की डाल में फंस गया है । (मैं) जब तक इसको छुड़ाती हूँ तब तक मेरी प्रतीक्षा करो । (शकुन्तला राजा को देखती हुई, बहाने से देर कर सखियो के साथ निकल जाती है) । राजा:-- नगर में जाने के प्रति मेरी उत्सुकता मन्द्‌ पड़ गयी है (अर्थात्‌ नगर की ओर जाने में मेरी उत्सुकता समाप्त हो गयी है) । तो अपने अनुयायियों से मिलकर उन्हे आश्रम से कुछ दूरी पर ठहराता हूँ । मै अपने को शकुन्तला के प्रेम-व्यापार से रोकने में असमर्थ हूँ । क्योकि (मेरा) शरीर (तो) आगे (अपने अनुयायियों) की ओर जा रहा है और (मेरा) मन (मुझसे) अपरिचित (पराया) सा (होकर) वायु के विपरीत ले जाये जाते हए ध्वजा (ध्वजदण्ड) के चीनी-वस्त्र (रेशमी वस्त्र) की भाँति पीछे (शकुन्तला) की ओर दौड़ रहा है । (सभी निकल जाते हैं) ।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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