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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 10
सूत, पश्यैनं व्यापाद्यमानम्‌ । (नेपथ्ये) भो भो राजन्‌, आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः । सुतः-(आकर्ण्यावलोक्य च) आयुष्मन्‌, अस्य खलु ते बाणपथवर्तिनः कृष्णसारस्यान्तरे तपस्विन उपस्थिताः । राजा-(ससंभ्रमम्‌ ) तेन हि प्रगृह्यन्तां वाजिनः । सूतः- तथा । (इति रथं स्थापयति) । (ततः प्रविशति सशिष्यो वैखानसः) वैखानसः- (हस्तमुद्यम्य) राजन्‌, आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यो न हन्तव्यः । न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन्‌ मृदुनि मृगशरीरे तूलराशाविवाग्निः । क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं क्व॒ च निशितनिपाता वन्रसाराः शरास्ते ।।
सारथि, मारे जाते हुये इस (मृग) को देखो, (अर्थात्‌ देखो, अब मैं इस मृग को मारता हूँ) । (ऐसा कह कर बाण चढ़ाने का अभिनय करते हैं) । (नेपथ्य में) हे राजन्‌ , यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये; मत मारिये । सारथि:-- (सुनकर और देखकर) हे आयुष्मन्‌ ! आप के बाण के मार्ग मे (अर्थात्‌ बाण के लक्ष्यभूत) इस मृग के (और आप के) बीच में तपस्वी उपस्थित हो गये हैं । राजा:-- (घबराहट के साथ) तो घोडे रोक लिये जाये । सारथि:-- ठीक है । (रथ को रोकता है ) । (तदन्तर शिष्यों के साथ तपस्वी प्रवेश करता है ) तपस्वी:-- (हाथ उठाकर) हे राजन्‌, यह आश्रम का मृग है, इसे मत मारिये, मत मारिये । इस कोमल मृग के शरीर पर रुई के ढेर पर अग्नि के समान, यह बाण न चलाइये (न छोडिये), न चलाइये (न छोडिये) । हाय ! बेचारे हरिणो का अत्यन्त चञ्चल जीवन कहाँ? और तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आप के बाण कहाँ?
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