राजा:--
(कान लगाकर) अरे, वृक्षों की वाटिका के दाहिनी ओर से वार्तालाप-सा सुनायी पड़ रहा है। तो यहाँ जाता हूँ। (घूमकर और देखकर) अरे, ये तपस्वियों की कन्यायें अपने आकार (सामर्थ्य) के अनुसार सिंचाई के (छोटे-छोटे) पड़ों से छोटे पेड़ों को पानी देने के लिये इधर ही आ रही हैं। (ध्यान से देखकर) अहो, इनका रूप (अत्यन्त) मनोहर है। अन्तःपुर (रनिवास) में दुर्लभ यह शरीर (लावण्य) यदि आश्रमवासी व्यक्ति का (है, तो) निश्चय ही उपवन की लतायें बन (जाल) की लताओं से (सौन्दर्यादि) गुणों के द्वारा तिरस्कृत कर दी गयी हैं (अर्थात् जङ्गल की लताओं ने अपने गुणों से उपबन की लताओं को परास्त कर दिया है)।
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