मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 16
राजा (कर्ण दत्वा) अये, दक्षिणेन वृक्षवाटिकामालाप इव श्रूयते । यावदत्र गच्छामि । (परिक्रम्यावलोक्य च) अपे, एतास्तपस्विकन्यकाः स्वप्रमाणानुरूपैः सेचनवटैर्वालपादपेभ्यः पयो दातुमित एवाभिवर्तते। (निपुर्ण निरूप्य) अहो, मधुरमासां दर्शनम्। शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य । दूरीकृताः खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः ।।
राजा:-- (कान लगाकर) अरे, वृक्षों की वाटिका के दाहिनी ओर से वार्तालाप-सा सुनायी पड़ रहा है। तो यहाँ जाता हूँ। (घूमकर और देखकर) अरे, ये तपस्वियों की कन्यायें अपने आकार (सामर्थ्य) के अनुसार सिंचाई के (छोटे-छोटे) पड़ों से छोटे पेड़ों को पानी देने के लिये इधर ही आ रही हैं। (ध्यान से देखकर) अहो, इनका रूप (अत्यन्त) मनोहर है। अन्तःपुर (रनिवास) में दुर्लभ यह शरीर (लावण्य) यदि आश्रमवासी व्यक्ति का (है, तो) निश्चय ही उपवन की लतायें बन (जाल) की लताओं से (सौन्दर्यादि) गुणों के द्वारा तिरस्कृत कर दी गयी हैं (अर्थात् जङ्गल की लताओं ने अपने गुणों से उपबन की लताओं को परास्त कर दिया है)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें