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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 12
राजा--एष प्रतिसंहतः । (इति यथोक्तं करोति) । वैखानसः- सदृशमेतत्‌ पुरुवंशप्रदीपस्य भवतः । जन्म यस्य पुरोर्वशो युक्तरूपमिदं तव । पुत्रमेवं गुणोपेतं चक्रवर्तिनमाप्नुहिं ।।
राजा:-- यह (बाण धनुष पर से) उतार लिया गया है । (राजा कथनानुसार करते हैं अर्थात्‌ बाण को धनुष से उतार लेते हैं ) तपस्वी:-- पुरुवंश के दीपक आप के लिये यह उचित ही है । जिसका पुरु के वंश में जन्म (हुआ है), (उस) आपके लिये यह (तपस्वी के कहने से बाण को धनुष से उतारना) अत्यन्त उचित है । (आप) इसी प्रकार के गुणों से युक्त चक्रवर्ती पुत्र को प्राप्त करें ।
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