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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 26
प्रियंवदा- आर्य, धर्मचरणेऽपि परवशोऽयं जनः । गुरोः पुनरस्या अनुरूपवरप्रदाने सङ्कल्पः । राजा-(आत्मगतं) न दुरवापेयं खलु प्रार्थनां । भव हदय साभिलाषं सम्प्रति सन्देहनिर्णयो जातः । आशङ्कसे यदग्नि तदिदं स्पर्शक्षमं रत्नम्‌ ।।
प्रियंवदा:-- आर्य, धर्माचरण में भी यह व्यक्ति (शकुन्तला) पराधीन है । फिर भी पिता कण्व (गुरु) का इसे योग्य वर को देने का (विचार) है । राजा:-- (अपने मन में) (निश्चय ही मेरी) यह (शकुन्तला प्रतिरूप) अभिलाषा (प्रार्थना), हे हृदय, अब (शकुन्तला के प्रति) अभिलाषा से युक्त हो जाओ । अब सन्देह का निर्णय हो गया । जिसको तुम अग्नि समझ रहे थे वह यह स्पर्श के योग्य रत्न है।
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