अच्छा, वृक्ष की ओट (आड़) में ही रहकर निश्चिन्ततापूर्वक इस (शकुन्तला) को देखता हूँ। (वैसा करता है) ।
शकुन्तला:--
सखी अनसूया, प्रियंवदा के द्वारा अत्यन्त कसकर बाँधे गये वल्कल (वृक्ष की छाल की चोली) से जकड़ दी गयी हूँ। जरा इसको ढीला कर दो।
अनसूया:--
अच्छा। (ढीला करती है)।
प्रियंवदा:--
(परिहास के साथ) यहाँ (इसके लिये) स्तनों का विस्तार करने वाले अपने यौवन को उलाहना दो। मुझे क्यों उलाहना दे रही हो ?
राजा:--
इसने ठीक कहा। कंधे पर लगायी गयी छोटी गाँठ वाले (और) स्तनों के विस्तार को ढक देने बाले वल्कल-वन से इस (शकुन्तला) का यह नवीन (अर्थात् यौवनयुक्त) शरीर, पीले पत्तों के मध्य-भाग से ढके हुए पुष्प के समान अपनी शोभा को पुष्ट (धारण) नहीं कर रहा है।
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