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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 18
भवतु, पादपान्तर्हित एव विश्रब्धं तावदेनां पश्यामि । (इति तथा करोति) । शकुन्तला -सखि अनसूये, अतिपिनद्धेन वल्कलेन प्रियंवदया नियन्निताऽस्मि । शिथिलय तावदेतत्‌ । (सहि अण्सुए, अदिपिणद्धेण वक्कलेण पिंवदए णिअन्तिद दि । सिढिलेहि दाव णं ।) अनसूया-- तथा । (तह ।) (इति शिथिलयति) । प्रियंवदा -(सहासम्‌) अत्र पयोधरविस्तारयितु आत्मनो यौवनमुपालभस्व । मां किमुपालभसे । (एत्थ पओहरविस्थरङत्तभं अत्तणो जीव्वणं उवालह । मं किं उवालहसि ।) राजा-सम्यगियमाह । इदमुपहितसुक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे स्तनयुगपरिणहाच्छादिना वल्कलेन । वपुरभिनवमस्याः पुष्यति स्वान शोभां कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोद्रेण ।।
अच्छा, वृक्ष की ओट (आड़) में ही रहकर निश्चिन्ततापूर्वक इस (शकुन्तला) को देखता हूँ। (वैसा करता है) । शकुन्तला:-- सखी अनसूया, प्रियंवदा के द्वारा अत्यन्त कसकर बाँधे गये वल्कल (वृक्ष की छाल की चोली) से जकड़ दी गयी हूँ। जरा इसको ढीला कर दो। अनसूया:-- अच्छा। (ढीला करती है)। प्रियंवदा:-- (परिहास के साथ) यहाँ (इसके लिये) स्तनों का विस्तार करने वाले अपने यौवन को उलाहना दो। मुझे क्यों उलाहना दे रही हो ? राजा:-- इसने ठीक कहा। कंधे पर लगायी गयी छोटी गाँठ वाले (और) स्तनों के विस्तार को ढक देने बाले वल्कल-वन से इस (शकुन्तला) का यह नवीन (अर्थात् यौवनयुक्त) शरीर, पीले पत्तों के मध्य-भाग से ढके हुए पुष्प के समान अपनी शोभा को पुष्ट (धारण) नहीं कर रहा है।
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