सूत्रधार(नेपथ्य की ओर देखकर)— आर्ये, यदि नेपथ्य-कार्य (अभिनेताओं का वेशविन्यास धारण आदि कार्य) पूर्णं हो गया हो, तो इधर आओ ।
नटी(आती हुई)— आर्यपुत्र, यह (मै उपस्थित) हूं।
सूत्रधार— आर्य, यह सभा अधिक विद्वानों से युक्त (भरी) है ।
आज हमे कालिदास के द्वारा विरचित कथा-वस्तु वाले अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नवीन नाटक के साथ उपस्थित होना है ।
अतः (नाटक के) प्रत्येक पात्र के विषय में प्रयत्न किया जाना चाहिये अर्थात् प्रत्येक पात्र के अभिनय पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है ।
नटी— आपके सुव्यवस्थित अभिनय के कारण कोई न्यूनता नहीं रहेगी ।
सूत्रधार— आर्ये, मेँ तुमसे यथार्थ (सच) कहता हूं।
विद्रानों के सन्तोष तक (अर्थात् जब तक विद्रान् सन्तुष्ट न हो जाए तब तक) भी अपने अभिनयकौशल को ठीक (सफल) नहीं मानता (क्योकि) अत्यधिक शिक्षित लोगो का भी चित्त (मन) अपने ऊपर विश्चासरहित होता है। (अर्थात् वे अपने ज्ञान के विषय में पूर्णतः विश्वस्त नहीं हो पाते)
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