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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 2
(नान्द्यन्ते ) सूत्रधारः ( नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) आर्ये यदि नेपथ्यविधानमवसि अमितस्तावदागम्यताम्‌ । ( प्रविश्य ) नटी:- आर्यपुत्र इयमस्मि । सूत्रधार- आर्ये ! अभिरूपभूयिष्ठा परिषदियम्‌ । अद्य खलु कालिदासग्रथितवस्तुनाऽभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः । तत्‌ प्रतिपात्रमाधीयतां यत्नः । नटी--सुविहितप्रयोगतयार्यस्य न किमपि परिहास्य । सूत्रधारः- आर्ये, कथयामि ते भूतार्थम्‌ । आपरितोषाद्‌ विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्‌ । बलवदपि शिक्षितानामात्सन्यप्रत्ययं चेतः ।।
( नान्दी पाठ की समाप्ति पर) सूत्रधार (नेपथ्य की ओर देखकर):-- आर्ये, यदि नेपथ्य-कार्य (अभिनेताओं का वेशविन्यास धारण आदि कार्य) पूर्णं हो गया हो, तो इधर आओ । नटी (आती हुई):-- आर्यपुत्र, यह (मै उपस्थित) हूं। सूत्रधार:-- आर्य, यह सभा अधिक विद्वानों से युक्त (भरी) है । आज हमे कालिदास के द्वारा विरचित कथा-वस्तु वाले अभिज्ञानशाकुन्तल नामक नवीन नाटक के साथ उपस्थित होना है । अतः (नाटक के) प्रत्येक पात्र के विषय में प्रयत्न किया जाना चाहिये अर्थात्‌ प्रत्येक पात्र के अभिनय पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है । नटी:-- आपके सुव्यवस्थित अभिनय के कारण कोई न्यूनता नहीं रहेगी । सूत्रधार:-- आर्ये, मेँ तुमसे यथार्थ (सच) कहता हूं । विद्रानों के सन्तोष तक (अर्थात्‌ जब तक विद्रान्‌ सन्तुष्ट न हो जाए तब तक) भी अपने अभिनयकौशल को ठीक (सफल) नहीं मानता (क्योकि) अत्यधिक शिक्षित लोगो का भी चित्त (मन) अपने ऊपर विश्चासरहित होता है (अर्थात्‌ वे अपने ज्ञान के विषय में पूर्णतः विश्वस्त नहीं हो पाते)
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