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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 31
(सर्वाः कर्ण दत्वा किञ्चदिव सम्भ्रान्ताः) राजा-(आत्मगतम्‌) अहो धिक्‌ । पौरा अस्मदन्वेषिणस्तपोवनमुपरुन्धन्ति । भवतु । प्रतिगमिष्यामस्तावत्‌ । सख्यौ- आर्य, अनेनारण्यकवृत्तान्तेन प्यकुलाः स्मः । अनुजानीहि न उटजगमनाय । राजा-(ससम्भ्रमम्‌) गच्छन्तु भवत्यः । वयमप्याश्रमपीडा यथा न भवति तथा प्रयतिष्यामहे । (सर्व उत्तिष्ठन्ति) । सख्यौ- आर्य, असम्भावितातिथिसत्कारं भूयोऽपि प्रेक्षणनिमित्तं लज्जामह आर्य विज्ञापयितुम्‌ । राजा-- मा मैवम्‌ । द्निनैव भवतीनां पुरस्कृतोऽस्मि । शकुन्तला-- अनसूये, अभिनवकुशसूच्या परिक्षत मे चरणं कुरबकशाखापरिलग्न च वल्कलम्‌ । तावत्‌ परिपालयत मां यावदेतन्मोचयामि । राजा-मन्दौत्सुक्योऽस्मि नगरगमनं प्रति । यावदनुयात्रिकान्‌ समेत्य नातिदूरे तपोवनस्य निवेशयेयम्‌ । न खलु शक्रोमि शकुन्तलाव्यापारादात्मानं निवर्तयितुम्‌ । मम हि-- गच्छति पुरः शरीरं धावति पश्चादसंस्तुतं चेतः । चीनांशुकमिव केतोः प्रतिवातं नीयमानस्य ।। (इति निष्क्रान्ताः सर्वे)
[ सभी (मुनिकन्याये) कान लगाकर (अर्थात्‌ सुनकर) कुछ घबरा सी जाती हैं ] राजा:-- (अपने मन में) ओह, धिक्कार है । नगरवासी मुझे खोजते हुए तपोवन को घेर रहे हैं । अच्छा, तो मैं लौट जाता हूँ । दोनों सखियाँ:-- आर्य, हम लोग इस जङ्गली हाथी (आरण्यक) के वृत्तान्त से घबरा गयी हैं । हमें कुटी (उटज) पर जाने की अनुमति दीजिये । राजा:-- (घबराहट के साथ) आप लोग जाइये । हम भी ऐसा प्रयत्न करेंगे, जिससे आश्रम.को कष्ट न हो । (सभी लोग उठ जाते हैं) । दोनों सखियाँ:-- आर्य, आपका अतिथि-सत्कार नहीं किया जा सका - ऐसे आप से पुनः दर्शन देने के लिये निवेदन करने में हम लोग लज्जित हो रही हैं । राजा:-- नही, ऐसा न (कहिये) । आप लोगो के दर्शन से ही मैं सत्कृत हो गया हूँ । शकुन्तला:-- अनसूया, नये कुशो की नोक से मेरा पैर क्षत (घायल) हो गया है और मेरा वल्कलवस्र कुरबक की डाल में फंस गया है । (मैं) जब तक इसको छुड़ाती हूँ तब तक मेरी प्रतीक्षा करो । (शकुन्तला राजा को देखती हुई, बहाने से देर कर सखियो के साथ निकल जाती है) । राजा:-- नगर में जाने के प्रति मेरी उत्सुकता मन्द्‌ पड़ गयी है (अर्थात्‌ नगर की ओर जाने में मेरी उत्सुकता समाप्त हो गयी है) । तो अपने अनुयायियों से मिलकर उन्हे आश्रम से कुछ दूरी पर ठहराता हूँ । मै अपने को शकुन्तला के प्रेम-व्यापार से रोकने में असमर्थ हूँ । क्योकि (मेरा) शरीर (तो) आगे (अपने अनुयायियों) की ओर जा रहा है और (मेरा) मन (मुझसे) अपरिचित (पराया) सा (होकर) वायु के विपरीत ले जाये जाते हए ध्वजा (ध्वजदण्ड) के चीनी-वस्त्र (रेशमी वस्त्र) की भाँति पीछे (शकुन्तला) की ओर दौड़ रहा है । (सभी निकल जाते हैं) ।
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