सभी (मुनिकन्याये) कान लगाकर (अर्थात् सुनकर) कुछ घबरा सी जाती हैं।
राजा—
(अपने मन में) ओह, धिक्कार है।
नगरवासी मुझे खोजते हुए तपोवन को घेर रहे हैं।
अच्छा, तो मैं लौट जाता हूँ।
दोनों सखियाँ—
आर्य, हम लोग इस जङ्गली हाथी (आरण्यक) के वृत्तान्त से घबरा गयी हैं।
हमें कुटी (उटज) पर जाने की अनुमति दीजिये।
राजा—
(घबराहट के साथ) आप लोग जाइये।
हम भी ऐसा प्रयत्न करेंगे, जिससे आश्रम.को कष्ट न हो। (सभी लोग उठ जाते हैं)।
दोनों सखियाँ—
आर्य, आपका अतिथि-सत्कार नहीं किया जा सका— ऐसे आप से पुनः दर्शन देने के लिये निवेदन करने में हम लोग लज्जित हो रही हैं।
राजा—
नही, ऐसा न (कहिये)।
आप लोगो के दर्शन से ही मैं सत्कृत हो गया हूँ।
शकुन्तला—
अनसूया, नये कुशो की नोक से मेरा पैर क्षत (घायल) हो गया है और मेरा वल्कलवस्र कुरबक की डाल में फंस गया है।
(मैं) जब तक इसको छुड़ाती हूँ तब तक मेरी प्रतीक्षा करो। (शकुन्तला राजा को देखती हुई, बहाने से देर कर सखियो के साथ निकल जाती है)।
राजा—
नगर में जाने के प्रति मेरी उत्सुकता मन्द् पड़ गयी है (अर्थात् नगर की ओर जाने में मेरी उत्सुकता समाप्त हो गयी है)।
तो अपने अनुयायियों से मिलकर उन्हे आश्रम से कुछ दूरी पर ठहराता हूँ।
मै अपने को शकुन्तला के प्रेम-व्यापार से रोकने में असमर्थ हूँ।
क्योकि (मेरा) शरीर (तो) आगे (अपने अनुयायियों) की ओर जा रहा है और (मेरा) मन (मुझसे) अपरिचित (पराया) सा (होकर) वायु के विपरीत ले जाये जाते हए ध्वजा (ध्वजदण्ड) के चीनी-वस्त्र (रेशमी वस्त्र) की भाँति पीछे (शकुन्तला) की ओर दौड़ रहा है।
(सभी निकल जाते हैं)
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