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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 24
(सर्वा राजानं दृष्ट्वा किञ्चिदिव सम्भ्रान्ताः) अनसूया- आर्य, न खलु किमप्यत्याहितम्‌ । इयं नौ प्रियसखी मधुकरेणाभिभूयमाना कातरीभूता । राजा-(रकुन्तलाभिमुखो भूत्वा) अपि तपो वधि । (शकुन्तला साध्वसादवचना तिष्ठति) अनसूया--इदानी मतिथिविशोषलाभेन । हला शकुन्तले गच्छोटजम्‌ । फलमिश्चमर्धमुपहर । इदं पादोदकं भविष्यति । राजा-- भवतीनां सूनृतयैव गिरा कृतमातिथ्यम्‌ । प्रियंवदा- तेन हास्या प्रच्छायशीतलायां सप्तपण्विदिकायां मुहूर्तमुपविश्य परिश्रमविनोदं करोत्वार्यः । राजा- नूनं युमप्यनेन कर्मणा परिश्रान्ताः । अनसूया--हला शकुन्तले, उचितं नः पर्युपासपनमतिथीनाम्‌ । अत्रोपविशामः । शकुन्तला- (आत्मगतम्‌) किं नु खल्विमं प्रक्ष्य तपोवनविरोधिनी विकारस्य गमनीयाऽस्मि संवृत्ता । राजा-(सर्वा विलोक्य) अहो समवयोरूपरमणीयं भवतीनां सौहार्दम्‌। प्रियवदा--(जनान्तिकम्‌) अनसूये, को नु खल्वेष चतुरगम्भीराकृतिर्मधुरं प्रियमालपन्‌ प्रभाववानिव लक्ष्यते । अनसूुया-- सखि, ममाप्यस्ति कौतूहलम्‌ । पृच्छामि तावदेनम्‌ । (प्रकाशम्‌) आर्यस्य मधुरालापजनितो विखरम्भो मां मन्रयते- कतम आर्येण राजर्षिवंशोऽ लङक्रियते 2 कतमो वा विरहपर्युत्सुकजनः कृतो देशः ? किनिमित्तं सुकुमारतरोऽपि तपोवनगमनप रिश्रमस्यात्मा पदमुपनीतः । शकुन्तला- (आत्मगतम्‌) हृदय मोत्तोम्य । एषा त्वया चिन्तितान्यनसूया म्रयते । राजा-(आत्मगतम्‌). कथमिदानीमात्मानं निवेदयामि, कथं वात्मापहारं करोमि । भवतु । एवं तावदेनां वश्ये । (प्रकाशम्‌) भवति, यः पौरवेण राज्ञा धर्माधिकारे नियुक्तः, सोऽहमविध्नक्रियोपलम्भाय धमरिण्यमिदमायातः । अनसूया-सनाथा इदानीं धर्मचारिणः । सख्यौ- (उभयोराकारं विदित्वा, जनान्तिकम्‌) हला शकुन्तले; यद्यत्राद्य तातः सन्निहितो भवेत्‌ । शकुन्तला-- ततः किं भवेत्‌। सख्यौ--इमं जीवितसर्वस्वेनाप्यतिथिविशोषं कृतार्थं करिष्यति । शकुन्तला- युवामपेतम्‌ । किमपि हदये कृत्वा मन्त्रयेथे 1 न युवयोर्वचनं श्रोष्यामि । राजा-- वयमपि तावद्‌ भवत्योः सखीगतं किमपि पृच्छामः । सख्यौ- आर्य, अनुग्रह इवेयमभ्यर्थना । राजा-- भगवान्‌ काश्यपः शाश्वते ब्रह्मणि स्थित इति प्रकाशः । इयं च वः सखी तदात्मजेति कथमेतत्‌ ? अनसूया-- शृणोत्वार्यः । अस्ति कोऽपि कौशिक इति गोत्रनामधेयो महाप्रभावी राजर्षिः । राजा-- अस्ति, श्रूयते । अनसूया-- तमावयोः प्रियसख्याः प्रभवमवगच्छ । उज्डतायाः शरीरसंवर्धनादिभिस्तात- काश्यपोऽस्याः पिता । राजा--उज्ज्ितशब्देन जनितं मे कौतूहलम्‌ । आमूलाच्छोतुमिच्छामि । अनसूया--श्वणोत्वार्यः । गौतमीतीरे पुरा किल तस्य राजर्षेरुग्रे तपसि वर्तमानस्य किमपि जातशङ्करदविर्मेनका नामाप्सराः प्रेषिता नियमनिध्नकारिणी । राजा--अस्त्येतदन्यसमाधि भीरुत्वं देवानाम्‌ । अनसूया- ततो वसन्तावतारसमये तस्या उन्मादयित्‌ रूपं प्रेक्ष्य -- राजा-- परस्ताज्ज्ञायत एव । सर्वथाप्सरः सम्भवैषा । अनसूया-अथ किम्‌ !! राजा--उपपद्यते । मानुषीषु कथं वा स्यादस्य रूपस्य सम्भवः । न प्रभातरलं ज्योतिरुदेति वसुधातलात्‌ ।।
(सभी ऋषि कन्याये राजा को देखकर कुछ घबरा सी जाती हैं) अनसूया— आर्य, कोई भी बड़ी विपत्ति नहीं है। हमारी यह प्रियसखी (शकुन्तला) भ्रमर के द्वारा पीडित (परेशान) होती हई भयभीत हो गयी थी। (शकुन्तला को दिखाती है)राजा(शकुन्तला की ओर मुख करके) क्या (आप का) तप बढ़ रहा है (अर्थात्‌ आप का तप निर्विघ्न तो चल रहा है न)(शकुन्तला घबराहट के कारण चुपचाप खड़ी रहती है)अनसूया— सम्प्रति (आप जैसे विशिष्ट) अतिथि के आगमन से (तप बढ़ रहा है)। हे सखी शकुन्तला, कुटी (उटज) में जाओ (और) फलयुक्त अर्घ (पूजन का द्रव्य) ले आओ। यह (घडे का जल) पैर धोने के लिये (पादोदक) होगा। राजा— आप लोगों की प्रिय वाणी से ही (मेरा) अतिथिसत्कार सम्पन्न हो गया। प्रियंवदा— तब तो (आप) घनी छाया से शीतल, सप्तपर्ण वृक्ष के (नीचे बनी हई) वेदी (चबूतरे) पर थोड़ी देर बैठकर (अपनी) थकान को दूर कर लें। राजा— निश्चत ही आप लोग भी इस (वृक्ष-सेचन के) कार्य से थक गयी होंगी । अनसूया— सखी शकुन्तला, हम लोगो को अतिथि के पास बैठना उचित है। यहाँ (हम लोग) बेठे। (सभी बेठ जाती हैं)शकुन्तला(अपने मन में) क्यों इस (व्यक्ति) को देखकर तपोवन के विरोधी विकार (काम-भावना) का पात्र (लक्ष्य) हो गयी हूँ। राजा(सबको देखकर) अहा, आप लोगों की मित्रता समान आयु और रूप के कारण रमणीय है। प्रियवदा(हाथ की ओट कर) अनसुया, यह सुंदर और गम्भीर आकृति वाला कौन है, जो मधुर और प्रिय (वाणी) बोलता हआ प्रभावशाली-सा प्रतीत हो रहा है। अनसुया— सखी, मुझे भी यह कौतूहल (जानने की इच्छा) है। अच्छा, इनसे पूछती हूँ। (प्रकट रूप से) आपके मधुर भाषण से उत्पन्न विश्वास मुझे (आप से कुछ पूछने के लिये) प्रेरित कर रहा है। आपके द्वारा कौन-सा राजर्षिवंश अलङ्कृत किया जा रहा है (अर्थात्‌ आप किस राजवंश में उत्पन्न हुये हैं)? किस देश के लोग आप के वियोग से व्याकुल बनाये गये हैं (अर्थात्‌ अप कहाँ से आये हैं)? किस कारण से (आप ने) अपने अत्यन्त सुकुमार शरीर को इस तपोवन मे आने के परिश्रम का पात्र बनाया है (अर्थात्‌ किस कारण आप इस तपोवन मे आए हैं)? शकुन्तला(अपने मन में) हृदय, अधीर मत होवो। तुम्हारे द्वारा सोचे गये (विषयो) को यह अनसूया पृछ रही है। राजा(अपने मन में) इस समय में अपने को किस प्रकार प्रकट करूँ अथवा अपने को किस प्रकार से छिपाऊं। अच्छा, इससे इस प्रकार कहता हूं। (प्रकट रूप में) आदरणीये, जो पुरुवंशोत्यत्र राजा दुष्यन्त के द्वारा धर्माधिकारी नियुक्त किया गया है, वह मैं निर्विध्न (धार्मिक) क्रियाओं को जानने के लिये इस तपोवन में आया हूं (अर्थात्‌ राजा दुष्यन्त ने मुझे यह जानने के लिये तपोवन मे भेजा है कि यह तपस्वियों की धार्मिक क्रियाएं निर्विध्न रूप से चल रही हैं)अनसूया— धर्म का आचरण करने वाले (तपस्वी लोग) अब सनाथ हो गये। (शकुन्तला श्रृंगार की लज्जा का अभिनय करती है)दोनों सखियाँ(दोनों राजा और शकुन्तला के आकार को जानकर हाथ से ओट करके) सखी शकुन्तला, यदि यहां आज पिता जी उपस्थित होते....... । शकुन्तला— तो क्या होता? दोनों सखियाँ— अपने जीवन के सर्वस्व (अर्थात्‌ प्राणप्रिय वस्तु) (तुम शकुन्तला) से भी इस विशिष्ट अतिथि को कृतार्थं करते। शकुन्तला— तुम दोनों हट जाओ। (तुम दोनों) कुछ मन में रखकर (ऐसा) कर रही हो। तुम दोनों की बातें नहीं सुनूंगी । राजा— हम भी आप दोनों की सखी के विषय में कुछ पृूछना चाहते हैं । दोनो सखियाँ— आर्य, (आप की) प्रार्थना (हम लोगों पर) अनुग्रह के समान है। राजा— कश्यप कुल में उत्पन्न पूज्य (कण्व) शाश्वत ब्रह्मचर्य में अवस्थित हैं (अर्थात्‌ नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं) यह प्रसिद्ध है। और आप की यह सखी (शकुन्तला) उनकी पुत्री है, यह कैसे? अनसुया— आर्य, सुनें। "कौशिक" इस गोत्र-नाम वाले कोई अत्यन्त प्रभावशाली राजर्षि हैं। राजा— हाँ, (एसा) सुना जाता है। अनसूया— उन (कौशिक) को हमारी प्रियसखी (शकुन्तला) का जन्मदाता (पिता) समझें। (माता-पिता से) परित्यक्त इसके शरीर के पालन-पोषण आदि के कारण तात कण्व इसके पिता हैं। राजा— "परित्यक्त' शब्द से मुझे जिज्ञासा (जानने की इच्छा) उत्पन्न हो गयी है। (मै इस बात को) प्रारम्भ से सुनना चाहता हूँ। अनसूया— आर्य, सुनें। पहले (पूर्वकाल में) गौतमी नदी के तट पर उग्र तपस्या में रत उस राजर्षिं से सशंकित (अर्थात्‌ भयभीत) देवताओं ने (उनकी) तपस्या (नियम) में विघ्न करने वाली मेनका नामक अप्सरा को भेजा। राजा— दूसरों की समाधि से भयभीत होना— यह देवताओं में (पाया जाता) है। अनसूया— तत्पश्चात्‌ वसन्तऋतु के आगमन के समय उस (मेनका) के उन्मादक रूप को देखकर ... । (आधा कहने पर लज्जा से रुक जाती है)राजा— आगे (का वृत्तान्त) ज्ञात ही हो जाता है कि यह (शकुन्तला) सर्वथा अप्सरा से उत्पन्न है (अर्थात्‌ अप्सरा की पुत्री है)अनसूया— और क्या! राजा— ठीक है, क्योकि मानव-स्त्रियों (मनुष्य-लोक की स्त्रियों) में इस सौन्दर्य (रूप) की उत्पत्ति कैसे हो सकती है (अर्थात्‌ नहीं हो सकती)। कान्ति से चमकती हुई बिजली (ज्योति) भूमि (भूतल) से उत्पन्न नहीं होती है।
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