फिर भी यथार्थ रूप से इस (शकुन्तला) का पता लगाऊगा ।
शकुन्तला:--
(घनराहट के साथ) ओह, जल के सींचने से घबड़ाकर (ऊपर) उड़ा हुआ (यह) भौंरा चमेली (नवमालिका) को छोडकर मेरे मुख की ओर आ रहा है । (भौंरे से पीडा का अभिनय करती है) ।
राजा:--
(अभिलाषा के साथ देख कर) हे भ्रमर, (तुम शकुन्तला की) चञ्चल नेत्र प्रान्त (अपाङ्ग) वाली तथा कांपती हई दृष्टि (नेत्रो को) बार-बार स्पर्श कर रहे हो । रहस्य की बात (गुप्त बात) कहने वाले की भाँति कान के समीप विचरण करते हुए मधुर-मधुर गुञ्जन कर रहे हो । (मना करने के लिये) हाथो को हिलाती हुई (इस शकुन्तला) के प्रेम (रतिक्रीडा) के सर्वस्व (भूत) अधर को पी रहे हो । हम (राजा दुष्यन्त) (तो) तथ्य के अन्वेषण (खोज) मे (ही) मारे गये, तुम तो निश्चय ही कृतार्थं (सफल) हो गये ।
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