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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 22
तथापि तत्त्वत एनामुपलप्स्ये । शकुन्तला-(ससम्भमम्‌) अम्मो, सलिलसेकसम्भ्रमोदतो नवमालिकामुज्डित्वा वदनं मे मधघुकरोऽभिव्तति । राजा-- (सस्पृहं विलोक्य) चलापाङ्गां दृष्टि स्पृशसि बहुशो वेपथुमतीं रहस्याख्यायीव स्वनसि मृद्‌ कर्णाम्तिकचरः । करौ व्याधुन्वत्याः पिबसि रतिसर्वस्वमधरं वयं तत्त्वान्वेषान्मधुकर हतास्त्वं खलु कृती ।।
फिर भी यथार्थ रूप से इस (शकुन्तला) का पता लगाऊगा । शकुन्तला:-- (घनराहट के साथ) ओह, जल के सींचने से घबड़ाकर (ऊपर) उड़ा हुआ (यह) भौंरा चमेली (नवमालिका) को छोडकर मेरे मुख की ओर आ रहा है । (भौंरे से पीडा का अभिनय करती है) । राजा:-- (अभिलाषा के साथ देख कर) हे भ्रमर, (तुम शकुन्तला की) चञ्चल नेत्र प्रान्त (अपाङ्ग) वाली तथा कांपती हई दृष्टि (नेत्रो को) बार-बार स्पर्श कर रहे हो । रहस्य की बात (गुप्त बात) कहने वाले की भाँति कान के समीप विचरण करते हुए मधुर-मधुर गुञ्जन कर रहे हो । (मना करने के लिये) हाथो को हिलाती हुई (इस शकुन्तला) के प्रेम (रतिक्रीडा) के सर्वस्व (भूत) अधर को पी रहे हो । हम (राजा दुष्यन्त) (तो) तथ्य के अन्वेषण (खोज) मे (ही) मारे गये, तुम तो निश्चय ही कृतार्थं (सफल) हो गये ।
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