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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 21
अनसूया-हला शकुन्तले, इयं स्वयवरवधुः सहकारस्य त्वया कृतनामधेया वनज्योत्स्नेति नवमालिका । एनां विस्मृतासि शकुन्तला- तदात्मानमपि विस्मरिष्यामि (लतामुपेत्यावलोक्य च) हला, रमणीये ` खलु काले एतस्य लतापादपमिथुनस्य व्यतिकरः संवृत्तः नवकुसुमयौवना वनज्योत्स्ना, बद्धपल्लवतयोपभोगक्षमः सहकारः । प्रियवदा--अनसुये, जानासि किं शकुन्तला वनज्योत्स्नामतिमात्रं पश्यतीति । अनसूया--न खलु विभावयामि । कथय । प्रियवदा--यथा वनज्योत्स्नाऽनुरूपेण पादपेन सङ्गता, अपि नामेवमहमप्यात्ममोऽनुरूपं वरं लभे येति ? शकुन्तला--एष नूनं तवात्मगतो मनोरथः । राजा--अपि नाम कुलपतेरियमसवणक्षित्रसम्भवा स्यात्‌ ? अथवा कृतं सन्देहेन । असंशयं श्चत्रपरिग्रहक्चमा यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । सता हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तः करणप्रवृत्तयः ।।
अनसूया:-- सखी शकुन्तला, यह आग्रवृक्ष (सहकार) की स्वयंवर-वधु (अपने आप वरण करने वाली वधू) नवमालिका है जिसका तुम्हारे द्वारा वनज्योत्स्ना (वन की चांदनी) नाम रखा गया हे । (क्या) इसको भूल गयी हो ? शकुन्तला:-- तब तो अपने को भी भूल जाऊंगी । (लता के समीप जाकर और देखकर) सखी, अत्यन्त सुन्दर समय में लता और वृक्ष के इस जोड़े का मिलन (व्यतिकर) हआ है । वनज्योत्स्ना नवीन पुष्परूपी यौवन से संवलित और आगप्रवृक्ष पत्तो से युक्त होने के कारण (इसका) उपभोग करने में समर्थ है । (देखती हई खड़ी हो जाती है) । प्रियवदा:-- अनसूया, (क्या तुम यह) जानती हो कि शकुन्तला किसलिये वनज्योत्स्ना को बहुत अधिक देख रही है ? अनसूया:-- नहीं जान पा रही हूँ । (तुम्हीं) बताओ । प्रियंवदा:-- जिस प्रकार वनज्योत्स्ना (अपने) अनुरूप (योग्य) वृक्ष से मिल गयी है (अर्थात्‌ अपने योग्य (वररूप) वृक्ष की जीवनसंगिनी बन गयी है), (उसी प्रकार) क्या मैं भी अपने योग्य (अनुरूप) वर को पाऊंगी ? शकुन्तला:-- यह निश्चय ही तुम्हारी अपनी अभिलाषा है (घडे को उड़लती है) । राजा:-- क्या यह सम्भव है कि यह (शकुन्तला) कुलपति (कण्व) की असवर्ण (ब्राह्मणेतर) पत्नी (क्षत्र) से उत्पन्न हुई हो ? अथवा सन्देह करने की आवश्यकता नहीं । (यह शकुन्तला) निः सन्देह क्षत्रिय के द्वारा पत्नी के रूप में ग्रहण करने योग्य (विवाह करने के योग्य) है, जिससे कि मेरा श्रेष्ठ मन इस (शकुन्तला) में अभिलाषा से युक्त (है) (अर्थात्‌ इसे चाहता है) । क्योकि सन्देहास्पद वस्तुओं (विषयो) मे सज्जनो के अन्तःकरण की प्रवृत्तियों (आत्मा की आवाज) ही प्रमाण (निर्णायक होती है) ।
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