अनसूया:--
सखी शकुन्तला, यह आग्रवृक्ष (सहकार) की स्वयंवर-वधु (अपने आप वरण करने वाली वधू) नवमालिका है जिसका तुम्हारे द्वारा वनज्योत्स्ना (वन की चांदनी) नाम रखा गया हे । (क्या) इसको भूल गयी हो ?
शकुन्तला:--
तब तो अपने को भी भूल जाऊंगी । (लता के समीप जाकर और देखकर) सखी, अत्यन्त सुन्दर समय में लता और वृक्ष के इस जोड़े का मिलन (व्यतिकर) हआ है । वनज्योत्स्ना नवीन पुष्परूपी यौवन से संवलित और आगप्रवृक्ष पत्तो से युक्त होने के कारण (इसका) उपभोग करने में समर्थ है । (देखती हई खड़ी हो जाती है) ।
प्रियवदा:--
अनसूया, (क्या तुम यह) जानती हो कि शकुन्तला किसलिये वनज्योत्स्ना को बहुत अधिक देख रही है ?
अनसूया:--
नहीं जान पा रही हूँ । (तुम्हीं) बताओ ।
प्रियंवदा:--
जिस प्रकार वनज्योत्स्ना (अपने) अनुरूप (योग्य) वृक्ष से मिल गयी है (अर्थात् अपने योग्य (वररूप) वृक्ष की जीवनसंगिनी बन गयी है), (उसी प्रकार) क्या मैं भी अपने योग्य (अनुरूप) वर को पाऊंगी ?
शकुन्तला:--
यह निश्चय ही तुम्हारी अपनी अभिलाषा है (घडे को उड़लती है) ।
राजा:--
क्या यह सम्भव है कि यह (शकुन्तला) कुलपति (कण्व) की असवर्ण (ब्राह्मणेतर) पत्नी (क्षत्र) से उत्पन्न हुई हो ? अथवा सन्देह करने की आवश्यकता नहीं । (यह शकुन्तला) निः सन्देह क्षत्रिय के द्वारा पत्नी के रूप में ग्रहण करने योग्य (विवाह करने के योग्य) है, जिससे कि मेरा श्रेष्ठ मन इस (शकुन्तला) में अभिलाषा से युक्त (है) (अर्थात् इसे चाहता है) । क्योकि सन्देहास्पद वस्तुओं (विषयो) मे सज्जनो के अन्तःकरण की प्रवृत्तियों (आत्मा की आवाज) ही प्रमाण (निर्णायक होती है) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।