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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 20
शकुन्तला-(अग्रतोऽवलोक्यं) एष वातेरितपल्लवाङ्कलीभिस्त्वरयतीव मां केसरवृक्षकः । (इति परिक्रामति) प्रियवदा--हला शकुन्तले, अत्रैव तावन्मुहूर्तं तिष्ठ । शकुन्तला-- किं निमित्तम्‌ ? प्रियवदा- यावत्‌ त्वयोपगतया लतासनाथ इवायं केसरवृक्षकः प्रतिभाति । शकुन्तला-- अतः खलु प्रियवदाऽसि त्वम्‌ । राजा-- प्रियमपि तथ्यमाह शकुन्तलां प्रियवदा । अस्या खलु-- अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू । कुसुममिव ` लोभनीयं यौवनमद्खेषु सन्नद्धम्‌ ।।
शकुन्तला(आगे की ओर देखकर) यह केसर (मौलश्री) वृक्ष वायु के द्वारा हिलायी जाती हुईं पत्ते रूपी अङ्गुलियों से मानों मुझको (अपने पास आने के लिये) शीघ्रता करा रहा है (अर्थात् मुझको शीघ्रता से अपने पास बुला रहा है)। तो मैं (सबसे पहले) इसका (जल-सेचन द्वारा) सत्कार करती हूँ। (घूमती है)प्रियंवदा— सखी शकुन्तला, क्षण भर (थोड़ी देर) यहीं ठहरो। शकुन्तला— किस लिये? प्रियंवदा— क्योंकि तुम्हारे द्वारा समीपस्थ (अर्थात् तुम्हारे समीप रहने से) यह मौलश्री (केसर) का वृक्ष लता (रूप स्त्री) से युक्त-सा प्रतीत हो रहा है। शकुन्तला— इसीलिये तुम प्रियंवदा (प्रिय बोलने वाली कही जाती) हो। राजा— प्रियंवदा ने शकुन्तला से प्रिय होने पर भी सच बात कही है। निश्चय ही इस (शकुन्तला) का अधरोष्ठ (नीचे का ओंठ) नवपल्लव (नये पत्ते) के समान लाल (है), भुजाएँ कोमल शाखाओं (डालियों) के सदृश है (और इसके) अंगों में पुष्प की भांति लुभावना (मनोहर) यौवन व्याप्त (है)
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