प्रियंवदा- (शकुन्तलां निरूध्य) हला न ते युक्तं गन्तुम् ।
शकुन्तला-(सभ्रूभद्म्) कि निमित्तम् ?
प्रियंवदा-- वृक्षसेचने दे धारयसि मे । एहि तावत्. । आत्मानं मोचयित्वा ततो गमिष्यसि ।
राजा- भद्रे, वृक्षसेचनादेव परिश्रान्तामत्र भवतीं लक्षये तथा ह्यस्याः-
सख्रस्तांसावतिमात्रलोहिततलौ बाहू घटोत्छेपणाद् अद्यापि स्तनवेपथुं जनयति श्वासः प्रमाणाधिकः । बद्धं कर्णशिरीषरोधि वदने धममम्भिसां जालकं बन्धे स्रंसिनि चैकहस्तयमिताः पयकुला मूर्धजाः ।।
प्रियंवदा:--
(शकुन्तला को रोककर) सखी, तुम्हारा जाना ठीक नहीं है ।
शकुन्तला:--
(भोंह टेडी करके) किस लिये ?
प्रियंवदा:--
वृक्ष सींचने (के कार्य) में तुम दो (वृक्षो को सींचने) की मेरी ऋणी हो (अर्थात् मैने तुम्हारे हिस्से के दो वृक्षो को सींचा था, अब तुम्हे मेरे हिस्से के दो वृक्षो को सींचना है ) तो चलो पहले अपने को (ऋण से) मुक्त कराकर तब जाना । (यह कहकर बलपूर्वक इसको लौटाती है) ।
राजा:--
भद्रे, वृक्षसेचन के कारण ही इन आदरणीया (शकुन्तला) को थकी हुई देख रहा हूँ । क्योकि इनकी, घडे को उठाने से (इसकी) (दोनों) भुजायें झुके हुए कांधो वाली और अत्यधिक लाल हथेली वाली (हो गयी हैं) । निश्चित मात्रा से अधिक चलने वाला श्वास वायु (सांस) अब भी स्तनों मे कम्पन उत्पन कर रहा है । मुख पर (कपोल पर), कर्णाभूषण रूप शिरीष (शिरस) के पुष्पों को रोकने वाले (अर्थात् चिपकाने वाले) पसीने की बूंदो का समूह व्याप्त है और केशबन्धन के शिथिल हो जाने पर (खुल जाने पर) एक हाथ से संभाले गये बाल बिखरे हुए हैं ।
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