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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 4
नटी- तथा (तह) । (इति गायति) ईषदीषच्चुम्बितानि भ्रमरैः सुकुमारकेसरशिखानि । अवतंसयन्ति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि ।।
नटी:-- (जैसा आप कह रहे है) वैसा (ही करती हूं) । (गाती है) युवतियां (सुंदरियां) दयायुक्त होकर भ्रमरों (भोरों) के द्वारा थोड़े-थोडे चूमे गये (आस्वादित) कोमल केसर-शिखा से युक्त शिरीष-पुष्पो को (अपने) कानों का आभूषण बना रही हैं ।
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