शकुन्तला:--
(रुष्ट-सी होकर) अनसूया, मैं चली जाऊगी ।
अनसूया:--
किसलिये ?
शकुन्तला:--
असम्बद्ध-प्रलाप (अनर्गल प्रलाप) करने वाली इस प्रियंवदा को आर्या गौतमी से कहूंगी (अर्थात् आर्या गौतमी से जाकर प्रियंवदा की शिकायत करूगी) ।
अनसूया:--
सखि, असत्कृत (जिसका सत्कार नहीं किया गया है ऐसे) विशिष्ट अतिधि को छोडकर स्वच्छन्दतापूर्वक चला जाना उचित नहीं है ।
(शकुन्तला बिना कुछ कहे ही चल पड़ती है)
राजा:--
(शकुन्तला को पकड़ने की इच्छा करता हुआ (भी) अपने को रोककर । अपने मन में) अहो, कामी-जनों (प्रेमियों) की मनोवृत्ति (उसकी) चेष्टाओं के अनुकूल (हुआ करती है) क्योकि मैं मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के पीछे जाने (पीछा करने) की इच्छा करता हुआ सहसा शिष्टतावशात् अवरुद्ध (रोकी हुई) गति वाला (मैं अपने) स्थान से उठकर न चलने पर भी मानो जाकर फिर लौट आया (हूँ) ।
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