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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 27
शकुन्तला- (सरोषमिव) अनसूये, गमिष्याम्यहम्‌ । अनसूया-- कि निमित्तम्‌ ? शकुन्तला- इमामसम्बद्धप्रलापिनीं प्रियवदामाययि गौतम्यै निवेदयिष्यामि । अनसूया- सखि, न युक्तमकृतसत्कारमतिथिविशोषं विसृज्य स्वच्छन्दतो गमनम्‌ । (शकुन्तला न किञ्चदुक्त्वा प्रस्थितैव) राजा--(ग्रहीतुमिच्छन्‌ निगृह्यात्मानम्‌ । आत्मगतम्‌) अहो चेष्टाप्रतिरूपिका कामिजनमनोवृत्तिः । अह हि-- अनुयास्यन्‌ मुनितनयां सहसरा विनयेन वारितप्रसरः । स्थानादनुच्चलन्नपि गत्वेव पुनः प्रतिनिवृत्तः ।।
शकुन्तला:-- (रुष्ट-सी होकर) अनसूया, मैं चली जाऊगी । अनसूया:-- किसलिये ? शकुन्तला:-- असम्बद्ध-प्रलाप (अनर्गल प्रलाप) करने वाली इस प्रियंवदा को आर्या गौतमी से कहूंगी (अर्थात्‌ आर्या गौतमी से जाकर प्रियंवदा की शिकायत करूगी) । अनसूया:-- सखि, असत्कृत (जिसका सत्कार नहीं किया गया है ऐसे) विशिष्ट अतिधि को छोडकर स्वच्छन्दतापूर्वक चला जाना उचित नहीं है । (शकुन्तला बिना कुछ कहे ही चल पड़ती है) राजा:-- (शकुन्तला को पकड़ने की इच्छा करता हुआ (भी) अपने को रोककर । अपने मन में) अहो, कामी-जनों (प्रेमियों) की मनोवृत्ति (उसकी) चेष्टाओं के अनुकूल (हुआ करती है) क्योकि मैं मुनि (कण्व) की पुत्री (शकुन्तला) के पीछे जाने (पीछा करने) की इच्छा करता हुआ सहसा शिष्टतावशात्‌ अवरुद्ध (रोकी हुई) गति वाला (मैं अपने) स्थान से उठकर न चलने पर भी मानो जाकर फिर लौट आया (हूँ) ।
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