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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 29
तदहमेनामनृणां करोमि । (उभे नाममुद्राक्षराण्यनुवाच्य परस्परमवलोकयतः) राजा--अलमस्मानन्यथा सम्भाव्य । राज्ञः परिग्रहोऽयम्‌ । प्रियंवदा--तेन हि नार्हत्येतदङ्गुली यकमङ गुली वियो गम्‌ । आर्यस्य वचनेनानृणेदानीमेषा । (किञ्चिद्विहस्य) हला शकुन्तले, मोचिताऽस्यनुकम्िनार्येण, अथवा महाराजेन ! गच्छेदानीम्‌ । शकुन्तला- (आत्मगतम्‌) यद्यात्मनः प्रभविष्यामि । (प्रकाशम्‌) का त्वं विस्रष्टव्यस्य रोद्धव्यस्य वा ? राजा- (शकुन्तलां विलोक्य । आत्मगतम्‌) किन्नु खलु यथा वयमस्यामेव-मियमप्यस्मान्‌ प्रति स्यात्‌ । अथवा लब्धावकाशा मे प्रार्थना । कुतः- वाचं न मिश्रयति यद्यपि मदचोभिः कर्ण ददात्यभिमुखं मयि भाषमाणे । कामं न तिष्ठति मदाननसम्मुखीना भूयिष्ठमन्यविषया न तु दृष्टिरस्याः ।।
तो मै इनको ऋणमुक्त करता हूं । (अंगूठी देना चाहता है) । (दोनों नामांकित अंगूठी के अक्षरो को पढ़कर, एक दूसरे को देखने लगती हैं) । राजा:-- हमें और कुछ (अर्थात्‌ दुष्यन्त राजा) न समझें । यह राजा का उपहार (परिग्रह) है । प्रियंवदा:-- तो यह अँगूठी (आप की) उंगली के वियोग के योग्य नहीं है । आपके कहने से (ही) यह (शकुन्तला) अब ऋणमुक्त हो गयी है । (कुछ हंसकर) सखी शकुन्तला, तुम (इन) दयालु आर्य अथवा महाराज के द्वारा मुक्त करा दी गयी हो । अब जाओ (जा सकती हो) । शकुन्तला:-- (अपने मन में) यदि अपने वश में होऊंगी (तब तो जाऊंगी) । (प्रकट रूप में) तुम (मुझे) छोड़ने या रोकने वाली कौन हो ? राजा:-- (शकुन्तला को देखकर अपने मन में) क्या जिस प्रकार हम इस पर (साभिलाष, अनुरक्त हैं) उसी प्रकार यह भी हमारे प्रति (अनुरक्त) हैं अथवा मेरी अभिलाषा को अवसर प्राप्त हो गया है (अर्थात्‌ मेरी इच्छा के पूर्ण होने के लक्षण दिखायी दे रहे हैं) । क्योकि यद्यपि (यह शकुन्तला) मेरी बातों से अपनी बात नहीं मिलाती है (अर्थात्‌ मेरे साथ बात नहीं करती है); (तथापि) मेरे बोलने पर मेरी ओर कान लगाये रखती है । भले ही (यह) मेरे मुख की ओर मुख कर नहीं रहती है, (तथापि) इसकी दृष्टि प्रायः अन्य विषयो (वस्तुओं) की ओर नहीं (रहती है) अर्थात्‌, मेरे अतिरिक्त किसी दूसरे की ओर नहीं जाती है ।
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