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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 25
(शकुन्तलाऽ धोमुखी तिष्ठति ।) राजा-(आत्मगतम्‌) लब्धावकाशो मे मनोरथः । किन्तु सख्याः परिहासोदाहतां वरप्रार्थनां श्रुत्वा धृतदैधभावकातरं मे मनः । प्रियवदा-- (सस्मितं शकुन्तलां विलोक्य नायकाभिमुखी भूत्वा) पुनरपि वक्तुकाम इवार्यः । राजा- सम्यगुपलक्षितं भवत्या । अस्ति नः सच्चरित्रश्रवणलोभादन्यदपि प्रष्टव्यम्‌ । प्रियंवदा--अलं विचार्य । अनियन्रणानुयोगस्तपस्विजनो नाम । राजा--इति सखीं ते ज्ञातुमिच्छामि । वैखानसं किमनया व्रतमाप्रदानाद्‌ व्यापाररोधि मदनस्य निषेवितव्यम्‌ । अत्यन्तमेव सदृशेक्चणवल्लभाभिराहो निवत्स्यति समं, हरिणाङ्गनाभिः ।।
(शकुन्तला नीचे मुख करके बैठी रहती है ।) राजा:-- (अपने मन में) मेरे मनोरथ को (पूर्ण होने का) अवसर प्राप्त हो गया । किन्तु सखी के द्वारा हंसी (परिहास) मे कहीं गयी पति (वर) की प्रार्थना को सुनकर मेरा मन दुविधा में होने के कारण व्याकुल (कातर) हो रहा है । प्रियंवदा:-- (मुस्कराहट के साथ शकुन्तला को देखकर नायक की ओर मुंह कर) सम्भवतः आर्य फिर कुछ कहना चाहते हैं (शकुन्तला सखी को उंगली से झिडकती है) । राजा:-- आपने ठीक समझा । सच्चरित सुनने के लोभ से हमे ओर भी पूछना है । प्रियंवदा:-- (आप) कुछ (भी) विचार करे । तपस्वी लोग अप्रतिबन्ध प्रश्न वाले होते हैं (अर्थात्‌ तपस्वी लोगो से कोई भी प्रश्न निसंकोच पुछा जा सकता है) । राजा:-- तुम्हारी सखी के विषय में यह जानना चाहता हूँ । क्या इस (शकुन्तला) के द्वारा कामदेव (प्रेम) के क्रियाकलापों को रोकने वाला तपस्वियों का व्रत (ब्रह्मचर्य व्रत) विवाह होने तक (ही) सेवित (पालन) किया जायेगा ? अथवा यह (ब्रह्मचारिणी के रूप मे) समान नेत्र होने के कारण प्रिय हरिणियो के साथ ही जीवनपर्यन्त निवास करेगी ?
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