(शकुन्तला नीचे मुख करके बैठी रहती है ।)
राजा:--
(अपने मन में) मेरे मनोरथ को (पूर्ण होने का) अवसर प्राप्त हो गया । किन्तु सखी के द्वारा हंसी (परिहास) मे कहीं गयी पति (वर) की प्रार्थना को सुनकर मेरा मन दुविधा में होने के कारण व्याकुल (कातर) हो रहा है ।
प्रियंवदा:--
(मुस्कराहट के साथ शकुन्तला को देखकर नायक की ओर मुंह कर) सम्भवतः आर्य फिर कुछ कहना चाहते हैं (शकुन्तला सखी को उंगली से झिडकती है) ।
राजा:--
आपने ठीक समझा । सच्चरित सुनने के लोभ से हमे ओर भी पूछना है ।
प्रियंवदा:--
(आप) कुछ (भी) विचार करे । तपस्वी लोग अप्रतिबन्ध प्रश्न वाले होते हैं (अर्थात् तपस्वी लोगो से कोई भी प्रश्न निसंकोच पुछा जा सकता है) ।
राजा:--
तुम्हारी सखी के विषय में यह जानना चाहता हूँ । क्या इस (शकुन्तला) के द्वारा कामदेव (प्रेम) के क्रियाकलापों को रोकने वाला तपस्वियों का व्रत (ब्रह्मचर्य व्रत) विवाह होने तक (ही) सेवित (पालन) किया जायेगा ? अथवा यह (ब्रह्मचारिणी के रूप मे) समान नेत्र होने के कारण प्रिय हरिणियो के साथ ही जीवनपर्यन्त निवास करेगी ?
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