अन्य दोनों (तपस्वी):--
(अपने-अपने हाथों को उठाकर कहते हैं) अवश्य ही चक्रवती पुत्र को प्राप्त करें ।
राजा:--
(प्रणाम पुर्वक) (आप ब्राह्मणों का वचन मैंने) स्वीकार कर लिया ।
तपस्वी:--
हे राजन्, हम लोग समिधा लाने के लिये निकले हुए हैं । यह (सामने) मालिनी नदी के तट पर कुलपति कण्व का आश्रम दिखायी पड़ रहा है । यदि (आपके) अन्य कार्य में विलम्ब (अतिपात) न हो तो (आश्रम में) प्रवेश कर (अर्थात् आश्रम में जाकर) अतिथिजनों के योग्य सत्कार को स्वीकार कीजिये । और भी तपस्वियो की निर्विघ्न (विघ्नो रहित) रमणीय (यज्ञादि) क्रियाओं को सम्यक् देखकर, धनुष की डोरी की रगड़ से उत्पन्न चिन्ह के द्वारा अलडकृत मेरी भुजा (प्रजा की) कितनी रक्षा करती हैं, यह (आप) जान लेंगे ।
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