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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 13
इतरौ-(बाह्‌ उद्यम्य) सर्वथा चक्रवर्तिनम्‌ पुत्रमाप्नुहि. । राजा-- (सप्रणामम्‌) प्रतिगृहीतम्‌ । वैखानसः- राजन्‌, समिदाहरणाय प्रस्थिता वयम्‌ । एषं खलु कण्वस्य कुलपतेरनुमालिनीतीरमाश्रमो दृश्यते । न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्य प्रतिगृहातामातिथेयः सत्कारः । अपिच- रम्यास्तपोधनानां प्रतिहतविघ्नाः क्रियाः समवलोक्य । ज्ञास्यसि कियद्‌ भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणाङ्क इति ।।
अन्य दोनों (तपस्वी):-- (अपने-अपने हाथों को उठाकर कहते हैं) अवश्य ही चक्रवती पुत्र को प्राप्त करें । राजा:-- (प्रणाम पुर्वक) (आप ब्राह्मणों का वचन मैंने) स्वीकार कर लिया । तपस्वी:-- हे राजन्‌, हम लोग समिधा लाने के लिये निकले हुए हैं । यह (सामने) मालिनी नदी के तट पर कुलपति कण्व का आश्रम दिखायी पड़ रहा है । यदि (आपके) अन्य कार्य में विलम्ब (अतिपात) न हो तो (आश्रम में) प्रवेश कर (अर्थात्‌ आश्रम में जाकर) अतिथिजनों के योग्य सत्कार को स्वीकार कीजिये । और भी तपस्वियो की निर्विघ्न (विघ्नो रहित) रमणीय (यज्ञादि) क्रियाओं को सम्यक्‌ देखकर, धनुष की डोरी की रगड़ से उत्पन्न चिन्ह के द्वारा अलडकृत मेरी भुजा (प्रजा की) कितनी रक्षा करती हैं, यह (आप) जान लेंगे ।
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