तपस्वी— अभी ही (अपनी) पुत्री शकुन्तला को अतिथि-सत्कार के लिये नियुक्त करके इसके (शकुन्तला के) प्रतिकूल भाग्य को शान्त करने के लिये सोमतीर्थं गये हैं ।
राजा— अच्छा, उसी (कुलपति की पुत्री) का ही दर्शन करुंगा।
वह मेरी (महर्षि कण्व के प्रति) भक्ति को जानकर महर्षि (कण्व) से कहेंगी।
तपस्वी— अच्छा, हम जाते हैं। (शिष्यों के साथ निकल जाता है)
राजा— सारथि, अश्वो को हांको। पवित्र आश्रम के दर्शन से अपने को पवित्र करें।
सारथि— आयुष्मन्! जैसी आप की आज्ञा (वह पुनः रथ के वेग का अभिनय करता है)।
राजा— (चारो ओर देखकर) सारथि, बिना कहे भी ज्ञात ही हो रहा है कि यह तपोवन की सीमा (आभोग) है।
सारथि— कैसे?
राजा— क्या आप नहीं देखते हैं।
क्योकि यहां (कहीं पर) वृक्षों के नीचे तोतो से युक्त कोटरो के द्वार से गिरे हुए नीवार (जङ्गली धान)(दिखायी पड़ रहे हैं)।
कहीं पर इङ्कदी के फलों को तोडने वाले चिकने पत्थर दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
(कहीं पर) विश्वास उत्पन्न हो जाने के कारण निःशङ्क (निर्भय) गति वाले हरिण (रथ की) ध्वनि (घरघराहट) को सहन कर रहे हैं (अर्थात् भय से इधर-उधर नहीं भाग रहे हैं) ।
और (कहीं पर) जलाशयो (सरोवर) की ओर जाने वाले मार्ग वल्कलवस्त्रो के छोर से टपकने वाले (जल की) रेखा से चिहित (दिखायी दे रहे हैं)।
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