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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 30
(नेपथ्ये) भो भोस्तपस्विनः सन्निहितास्तपोवनसत्त्वरक्षायै भवत । प्रत्यासन्नः किल | मृगयाविहारी पार्थिवो दुष्यन्तः । तुरगखुरहतस्तथा हि रेणार्विटपनिषक्तजलार््रवल्कलेषु । | चतति परिणतारुणप्रकाशः शलभसमूह इवाश्रमद्रुमेषु ।। अपि च-- तीव्राघातप्रतिहततरुस्कन्धयलग्नैकदन्तः पादाकृष्टत्रततिवलयासङ्सञ्जातपाशः । मूर्तो विध्नस्तपस इव नो भिन्नसारङ्गयुथो धमरिण्यं प्रविशति गजः स्यन्दनालोक भीतः ।।
(नेपथ्य में) हे हे तपस्वियो, तपोवन के प्राणियों (सत्त्वो) की रक्षा के लिये आप लोग (उन प्राणियों के) समीपवर्ती हो जाइये । शिकार के लिये विचरण करने वाला राजा दुष्यन्त (आश्रम के) पास में आ गया है । क्योकि घोड़ों के खुरो से उठायी (उड़ायी) गयी सायंकालीन (अर्थात्‌ अस्त होते हुये) सूर्य की कान्ति के तुल्य (लाल) कान्ति वाली धूल पतद्गों के समूह (टिड्डियों के दल) की भाँति आश्रम के (उन) वृक्षों पर गिर रही (पड़ रही) है, जिनकी शाखाओं (डालियों) पर मुनियों के जल से गीले वल्कलवसख (सुखने के लिये) डाले गये (फैलाये गये) हैं । रथ को देखने से भयभीत, तीत्र (कठोर) प्रहार से सामने के वृक्ष की शाखा (डाली) में टूटे हुये एक दांत वाला, पैरो से खीचे गये लतासमूह के लिपटने से (पैर मे) पड़ी हुयी बेड़ी वाला तथा हरिणसमूह को छिन्न-भिन्न (तितर-बितर) कर देनेवाला (यह) हाथी हम लोगों की तपस्या के शरीरधारी विध्न की भाँति तपोवन में प्रवेश कर रहा है ।
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