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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 5
सूत्रधार- आर्ये, साधु गीतम्‌ । अहो, रागबद्धचित्तवृत्तिरालिखित इव सर्वतो रङ्गः, तदिदानीं कतमत्‌ प्रकरणमाश्रित्यैनमाराधयामः । नटी- नन्वार्यमिश्रैः प्रथममे वाज्ञप्तमभिज्ञानशाकुन्तलं नामापूर्वं नाटकं प्रयोगेऽधिक्रियतामिति । सूत्रधार-- आर्ये, सम्यगनुबोधितोऽस्मि । अस्मिन्‌ क्षणे विस्मृतं खलु मया । कुतः तवास्मि गीतरागेण हारिणा प्रसभं हतः । एष राजेव दुष्यन्तः सारंगेणातिरंहसा ।। (इति निष्क्रान्तौ) इति प्रस्तावना
सूत्रधार:-- आर्य (तुमने बहुत) अच्छा गाया । अहा, राग (गान-राग) के द्वारा आकृष्ट चित्तवृत्ति (अन्तः करण) वाली नास्य-शाला (दर्शक लोग) चित्रित सी (चित्रलिखित सी) लग रही है । तो अब किस प्रकरण (नाटक) को लेकर (अर्थात्‌ किस नाटक का अभिनय करके) इस (नास्यशाला) को सन्तुष्ट (प्रसन्न) किया जाय । नटी:-- अरे पृज्य, आपके द्वारा पहले ही आदेश दिया गया था कि अभिज्ञानशाकुन्तल नामक अपूर्व (अनुपम) नाटक का अभिनय (प्रयोग) किया जाय । सूत्रधार:-- आर्ये, (तुम्हारे द्वारा) ठीक स्मरण कराया गया है (अर्थात्‌ तुमने अच्छी याद्‌ दिलायी) । इस समय मेँ (यह) भूल (ही) गया था । क्योकि आपके मनमोहक गीत ने मुझे मोहित कर लिया था। जैसे हमारे नाटक के नायक को हिरण ने मोहित कर लिया। (दोनो सूत्रधार एवं नटी मञ्च से जाते है) यहां पर प्रस्तावना समाप्त होती है।
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