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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 6
(ततः प्रविङति मृगानुसारी सशरचापहस्तो राजा रथेन सूतश्च) सूतः- (राजानं मृगं चावलोक्य) आयुष्मन्‌, कृष्णसारे ददच्चक्षुस्त्वयि चाधिज्यकार्मुके । मृगानुसारिणं साक्षात्‌ पश्यामीव पिनाकिनम्‌ । ।
(इसके बाद्‌ हरिण का पीछा करते हये, बाण चढ़ा हुआ धनुष हाथ मे लिये हुये राजा ओर सारथि रथ पर बैठे हुये प्रवेश करते है) । सूत:- (राजा ओर हरिण को देखकर) चिरञ्जीविन्‌, कृष्णसार हरिण और चढ़ी हुई प्रत्यंचा वाले धनुष से युक्त आप (दुष्यन्त) के ऊपर दृष्टिपात करता हुआ (मैं) मानों हरिण का पीछा करते हुये साक्षात्‌ धनुर्धारी शिव को देख रहा हूं।
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