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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 23
शकुन्तला- नैष धृष्टो विरमति । अन्यतो गमिष्यामि । (पदान्तरे स्थित्वा सदृष्टिक्षेपम्‌) कथमितोऽप्यागच्छति । हला, परित्रायेथां मामनेन दुर्विनीतेन मधुकरेणाभिभूयमानाम्‌ । उभे- (सस्मितम्‌) के आवां परित्रातुम्‌ । दुष्यन्तमाक्रन्द । राजरक्षितव्यानि तपोवनानि नाम । राजा-अवसरोऽ यमात्मानं प्रकाशयितुम्‌ । न भेतव्यं न भेतव्यम्‌ (इत्यधेक्ति. स्वगतम्‌) राजभावस्त्वभिनज्ञातो भवेत्‌ । भवतु । एवं तावदभिधास्ये । शकुन्तला-- (पदान्तरे स्थित्वा सदृष्टिक्षेपम्‌) कथमितोऽपि मामनुसरति । राजा--(सत्वरमुपसृत्य) कः पौरवे वसुमतीं शासति शासितरि दुर्विनीतानाम्‌ । अयमाचरत्यविनयं मुग्धासु तपस्विकन्यासु ।।
शकुन्तला:-- यह ढीठ (भ्रमर) नहीं रुक रहा हैं । दूसरी ओर जाती हूँ । (कुछ पग चलने के पश्चात्‌ रुककर, -दृष्टिपात करती हुई) क्या इधर भी आ रहा है । सखी, इस दुष्ट भ्रमर से पीडित की जाती हुई मुञ्चको बचाओ । दोनो:-- (मुस्कराकर) हम दोनो (तुम्हे) बचाने वाली कौन हैँ । (राजा) दुष्यन्त को पुकारो । (क्योकि) तपोवन राजा के द्वारा रक्षणीय होते हैं । राजा:-- यह अपने को प्रकट करने का (उचित) अवसर है । मत डरो, मत डरो (ऐसा आधा कहकर अपने मन मे) किन्तु (इससे मेरा) राजत्व (राजा होना) परिज्ञात हो जायेगा । अच्छा, तो इस प्रकार कहूँगा । शकून्तला:-- (कुछ पग चलने के पञ्चात्‌ रुककर दृष्टिपात करती हई) क्या इधर भी (यह) मेरा पीछा कर रहा है । राजा:-- (शीघ्र आगे बढ़कर) दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) पुरुवंशी राजा दुष्यन्त के पृथ्वी (भूमण्डल) का शासन करते हए कोन यह भोली-भाली तपस्विकन्याओं के साथ अशिष्टता का व्यवहार (आचरण) कर रहा है ?
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