शकुन्तला:--
यह ढीठ (भ्रमर) नहीं रुक रहा हैं । दूसरी ओर जाती हूँ । (कुछ पग चलने के पश्चात् रुककर, -दृष्टिपात करती हुई) क्या इधर भी आ रहा है । सखी, इस दुष्ट भ्रमर से पीडित की जाती हुई मुञ्चको बचाओ ।
दोनो:--
(मुस्कराकर) हम दोनो (तुम्हे) बचाने वाली कौन हैँ । (राजा) दुष्यन्त को पुकारो । (क्योकि) तपोवन राजा के द्वारा रक्षणीय होते हैं ।
राजा:--
यह अपने को प्रकट करने का (उचित) अवसर है । मत डरो, मत डरो (ऐसा आधा कहकर अपने मन मे) किन्तु (इससे मेरा) राजत्व (राजा होना) परिज्ञात हो जायेगा । अच्छा, तो इस प्रकार कहूँगा ।
शकून्तला:--
(कुछ पग चलने के पञ्चात् रुककर दृष्टिपात करती हई) क्या इधर भी (यह) मेरा पीछा कर रहा है ।
राजा:--
(शीघ्र आगे बढ़कर) दुष्टो के शासक (दण्ड देने वाले) पुरुवंशी राजा दुष्यन्त के पृथ्वी (भूमण्डल) का शासन करते हए कोन यह भोली-भाली तपस्विकन्याओं के साथ अशिष्टता का व्यवहार (आचरण) कर रहा है ?
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