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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 8
सूतः- आयुष्मन्‌, उदघातिनी भूमिरिति मया रश्मिसयमनाद्‌ रथस्य मन्दीकृतो वेगः । तेन मृग एष विप्रकृष्टान्तरः संवृत्तः । सम्प्रति समदेशवर्तिनस्ते न दुरासदो भविष्यति । राजा-- तेन हि मुच्यन्तामभीषवः । सूतः--यदाज्ञापयत्यायुष्मान्‌ । (रथवेगं निरूप्य) आयुष्मन्‌, पश्य पश्य--मुक्तेषु रश्मिषु निरायतपूर्वकाया निष्कम्पचामरशिखा निभूतोर्ध्वकर्णाः । आत्मोद्धतैरपि रजोभिरलङ्घनीया ` धावन्त्यमी मृगजवाक्षमयेव रथ्याः ।!
सारथि:-- चिरञ्जीविन्‌, भूमि ऊची-नीची थी, इसलिए मेने लगाम को खीच कर रथ का वेग (चाल) धीमा कर दिया था । इससे यह मृग अधिक दूरवर्ती हो गया है । अब समतल भूमि पर स्थित आप के लिए (यह) दुर्लभ नहीं होगा (अर्थात्‌ आप इसे सरलता से प्राप्त कर लेंगे)। राजा:-- तो लगाम ढीली कर दो। सारथि:-- जो आप की आज्ञा । (रथ वेग का अभिनय कर) चिरञ्जीविन्‌, देखिये-देखिये लगाम को ढीली कर दिये जाने पर ये रथ के घोड़े मानों हरिण के वेग को सहन न कर सकने के कारण शरीर के आगे के भाग को फेलाये हुये, (शिर पर विद्यमान) कलंगी (चमर) के निश्चल अग्रभाग (शिखा) से युक्त, निश्चेष्ट तथा ऊपर उठे हुये कानों वाले, अपने (पैरो के) द्वारा उठायी (उडायी) गयी धूल से भी अलङ्घनीय (होकर) दौडे रहे हें ।
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