सारथि:--
चिरञ्जीविन्, भूमि ऊची-नीची थी, इसलिए मेने लगाम को खीच कर रथ का वेग (चाल) धीमा कर दिया था । इससे यह मृग अधिक दूरवर्ती हो गया है । अब समतल भूमि पर स्थित आप के लिए (यह) दुर्लभ नहीं होगा (अर्थात् आप इसे सरलता से प्राप्त कर लेंगे)।
राजा:--
तो लगाम ढीली कर दो।
सारथि:--
जो आप की आज्ञा । (रथ वेग का अभिनय कर) चिरञ्जीविन्, देखिये-देखिये लगाम को ढीली कर दिये जाने पर ये रथ के घोड़े मानों हरिण के वेग को सहन न कर सकने के कारण शरीर के आगे के भाग को फेलाये हुये, (शिर पर विद्यमान) कलंगी (चमर) के निश्चल अग्रभाग (शिखा) से युक्त, निश्चेष्ट तथा ऊपर उठे हुये कानों वाले, अपने (पैरो के) द्वारा उठायी (उडायी) गयी धूल से भी अलङ्घनीय (होकर) दौडे रहे हें ।
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