राजा- सत्यम् । अतीत्य हरितो हरीश्च वर्तन्ते वाजिनः । तथा हि यदालोके सुक्ष्म व्रजति सहसा तद् विपुलां यदद्धा विच्छिन्नं भवति कृतसन्धानमिव तत् । प्रकृत्या यद् वक्र तदपि समरेखं नयनयोन मे दूरे किञ्चित् क्षणमपि न पार्धे रथजवात् ।।
राजा:--
सच है । (ये) घोड़े सूर्य और इन्द्र के घोड़ों का भी (वेग में) अतिक्रमण कर रहे हैं (अर्थात् इन घोड़ों ने सूर्यं तथा इंद्र के घोड़ो को भी परास्त कर दिया है ।) क्योकि रथ के वेग के कारण जो (वस्तु दूर से) देखने मे छोटी (दिखायी पडती है), वह अकस्मात् विशालता को प्राप्त हो जाती है (अर्थात् बड़ी जो जाती है ) । जो (वृक्षादि वस्तु) वस्तुतः विभक्त (कटी हुई पृथक् प्रथक् है), वह जुडी हुई सी (मिली हुई सी) (प्रतीत) होती है । जो (वस्तु) स्वभावतः टेडी है, वह भी ओंखो के लिये सीधी-सी (हो जाती है ।) (सम्प्रति) क्षण भर के लिये भी कोई (वस्तु) न मुञ्जसे दूर है और न पास है ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।