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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 7
राजा- सुत, दूरममुना सारङ्गेण वयमाकृष्टाः । अयं पुनरिदानीमपि -- ग्रीवाभकङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टिः पश्चार्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद्‌ भूयसा पूर्वकायम्‌ । दर्भरधविलीठैः श्रमविवृतमुखभ्रशिभिः कीर्णवर्त्मा पश्योदग्रच्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्यां प्रयाति ।।
राजा:-- सारथि, इस मृग के द्वारा हम लोग (बहुत) दूर खींच लाये गये है । यह (मृग) तो इस समय भी देखो, पीछे दोडते हुये (हमारे) रथ पर पुनः-पुनः गर्दन मोडकर मनोहरता से दृष्टि डालता हुआ, बाण लगने के भय के कारण (अपने) अधिकांश पिछले अर्धं भाग से अगले भाग मे सिमटा हुआ (अर्थात्‌ शरीर के पिछले भाग को अगले भाग की ओर समेटे हुये), श्रम के कारण खुले हुये मुख से अर्धचर्वित (आधे चबाये हुये) कुशो से मार्गं को व्याप्त करता हुआ, ऊची छलांग (चौकड़ी) भरने के कारण जैसे आकाश मे अधिक (और) पृथ्वी पर कम ही दौड रहा है ।
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