राजा:--
सारथि, इस मृग के द्वारा हम लोग (बहुत) दूर खींच लाये गये है । यह (मृग) तो इस समय भी देखो, पीछे दोडते हुये (हमारे) रथ पर पुनः-पुनः गर्दन मोडकर मनोहरता से दृष्टि डालता हुआ, बाण लगने के भय के कारण (अपने) अधिकांश पिछले अर्धं भाग से अगले भाग मे सिमटा हुआ (अर्थात् शरीर के पिछले भाग को अगले भाग की ओर समेटे हुये), श्रम के कारण खुले हुये मुख से अर्धचर्वित (आधे चबाये हुये) कुशो से मार्गं को व्याप्त करता हुआ, ऊची छलांग (चौकड़ी) भरने के कारण जैसे आकाश मे अधिक (और) पृथ्वी पर कम ही दौड रहा है ।
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