वायु के द्वारा चञ्चल, सिचाई की नालियों के जलों से वृक्षों की जड़ें घुली गयी हैं। घृत के धूम (धुएँ) के उठने से किसलयों (कोमल पत्तों) की कान्ति की लालिमा नष्ट हो गयी है और ये निर्भीक हरिणों के बच्चे काटे गये (तोड़े गये) कुशों के अङ्कुर वाली उद्यान भूमि पर समीप में ही धीरे-धीरे विचरण कर रहे हैं ।
सारथि:--
(आपने जो कुछ कहा है वह) सब ठीक है ।
राजा:--
(थोड़ी दूर जाकर्) तपोवन के निवासियों को (किसी प्रकार का) विघ्न न होने पाये । इसलिये यहाँ ही रथ को रोको, जब तक मैं उतरता हूं ।
सारथि:--
(मैने) लगाम खीच ली है । श्रीमान् (आयुष्मान्) उतरें ।
राजा:--
(उतरकर) सारथि, तपोवनों (आश्रमों) में सादे वेष से ही प्रवेश करना चाहिये। तो यह लो (सारथि को आभूषण और धनुष उत्तार कर देते हैं)। सारथि, जब तक मैं आश्रमवासियों को देखकर लौटता हूँ तब तक घोड़े भींगी पीठ वाले किये जायें (अर्थात् घोड़ों को स्नान करा दो)।
सारथि:--
वैसा ही (होगा) । (निकल जाता है) ।
राजा:--
(घूमकर और देखकर) यह आश्रम का (प्रवेश) द्वार है । अच्छा, प्रवेश करता हूँ (प्रवेश कर शकुन को सूचित करते हुए) यह आश्रम का स्थान शान्त है और (मेरी दाहिनी) भुजा फड़क रही है । यहाँ इस (दाहिनी भुजा के फड़कने) का फल कहाँ (प्राप्त हो सकता है)? अथवा भावी (होनहार) घटनाओं के द्वार (मार्ग) सभी स्थानों पर (सुलभ) हो जाते हैं।
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