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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 17
यावदिमां छायामाश्रित्य प्रतिपालयामि । (इति विलोकयन्‌ स्थितः) । ( ततः प्रविशति यथोक्तव्यापारा सह सखीभ्यां शकुन्तला) शकुन्तला-इत इतः सख्यौ । (इदो इदो सहीओ ।) अनसूया-हला शकुन्तले, त्वत्तोऽपि तातकाश्यपस्याश्रमवृक्षकाः प्रियतरा इति तर्कयामि । येन नवमालिकाकुसुमपेलवाऽपि त्वमेतेषामालवालपूरणे नियुक्ता । (हला सउन्दले, तुवत्तो वि तादकस्सवस्स अस्समरूक्खआ पिअद्रेप्ति तक्केमि । जेण णोमिलिआकुसुमपेलवा वि तुमं एदाणं आलवालपूरणे णिउत्ता ।) शकुन्तला न केवलं तातनियोग एव । अस्ति मे सोदरस्नेहोऽप्येतेषु । (ण केवलं तादणिओओ एव्व । अत्थि में सोदरसिणोहो वि एदसु) (इति वृक्षसेचनं रूपयति ।) राजा-कथमिय सा कण्वदुहिता । असाधुदर्शी खलु तत्रभवान्‌ काश्यपः, य इमामाश्रमधर्मे नियुङ्क्ते । इदं किलाव्याजमनोहरं वपुस्तपःक्षमं साधयितु य इच्छति । ध्रुवं स नीलोत्यलपत्रधारया शमीलतां छत्तुमृषिर्व्यवस्यति ।।
तो इस (पेड़ की) छाया का आश्रय लेकर प्रतीक्षा करता हूँ (देखता हुआ खड़ा हो जाता है) । (तत्पश्चात्‌ पूर्वोक्त कार्य करती हुई दो सखियों के साथ शकुन्तला प्रवेश करती है) । शकुन्तला:-- सखियों, इधर से, इधर से (आओ) । अनसुया:-- अरी शकुन्तला, मैं ऐसा सोचती हूँ पिता कण्व (काश्यप) को आश्रम के वृक्ष तुमसे भी अधिक प्रिय है। इसीलिये चमेली (नवमालिका) के पुष्प जैसी कोमल (होने पर) भी तुम (उनके द्वारा) इन (वृक्षों) के घाले (आलवाल) भरने (के कार्य) में नियुक्त की गयी हो । शकुन्तला:-- केवल पिता (कण्व) की आज्ञा ही नहीं है, मेरा भी इन (वृक्षों) पर सगे भाई के समान प्रेम है (वृक्षों के सींचने का अभिनय करती है।) राजा:-- क्या यही वह कण्व की पुत्री (शकुन्तला) है ? (जिसके विषय में मैने तपस्वी से सुना था) पूजनीय कण्व निश्चय ही (वस्तुओं का) ठीक मूल्याङ्कन करने वाले नहीं हैं (अर्थात्अ विवेकी है), जिन्होंने इस (शकुन्तला) को आश्रम के कार्यों में नियुक्त किया है। जो ऋषि (कण्व) सहज सुन्दर (किसी कृत्रिम साधन के बिना सुन्दर) (शकुन्तला के) इस शरीर को, तपस्या करने के योग्य बनाना चाहते हैं, वे निश्चय ही नील-कमल के पत्ते की धार (अग्र भाग) से शमी (वृक्ष) की लता को काटने का प्रयत्न कर रहे हैं।
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