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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 1 • श्लोक 19
अथवा काममननुरूपमस्या वपुषो वल्कलं न पुनरलङ्कारश्रियं न पुष्यति कुतः-- सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि ` तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्‌ ।।
अथवा भले ही (यह) वल्कल-वस्त्र इस (शकुन्तला) के शरीर के योग्य (अनुरूप) नहीं है । (तथापि यह शकुन्तला के इस शरीर पर) आभूषण की शोभा को धारण नहीं कर रहा है, ऐसी बात नहीं (अर्थात् अलङ्कार की शोभा को धारण कर रहा है)। क्योंकि सेवार (शेवाल) से आच्छादित (घिरा हुआ) भी कमल रमणीय (लगता है)। मलिन (काला) कलङ्क भी चन्द्रमा की शोभा को बढ़ाता है। वल्कल-वस्त्र से भी यह कृशाङ्गी (शकुन्तला) अत्यन्त सुन्दर (लग रही है)। क्योंकि सुन्दर (रम्य) आकृतियों (शरीरों) के लिये कौन-सी वस्तु अलङ्कार नहीं होती है (अर्थात् सभी वस्तुयें शोभावर्धक बन जाती हैं)।
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