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अध्याय 18 — सगुणनिर्गुणयोरैक्य

प्रबोधसुधाकर
33 श्लोक • केवल अनुवाद
श्रुतियों और महापुराणों ने जो सगुण और निर्गुण की एकता गूढ़भाव से कही है, उसी को मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ।
जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृति से परे परमात्मा सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित है यह यदुकुल-भूषण श्रीकृष्ण वही तो है।
यदि कहो कि यह श्रीकृष्ण तो सगुण है, दृश्य शरीरधारी है, एकदेशी है तथा साधारण पुरुषों के समान रागद्वेषयुक्त है; यह परमात्मा कैसे हो सकता है?
तो इस विषय में यह विचारना चाहिये कि इन चर्म-चक्षुओं से तो अन्य सब दृश्य-पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, इनसे भगवान् दिखायी नहीं दे सकते; वे तो ज्ञान-दृष्टि के ही विषय हैं।
भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुन को दिव्य-दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरि की अदृश्यता सिद्ध ही है (क्योंकि चर्म-चक्षुओं से न दोख सकने के कारण ही तो उन्होंने अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी थी)।
जिस प्रकार गोलाकार सूर्य-मण्डल साक्षात् एक देश में ही दिखायी देता है, किन्तु वह सम्पूर्ण जगत्‌ को प्रकाशित करता है और सब को एक साथ ही सब जगह दीखता भी है।
उसी प्रकार यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायी देते हैं तथापि वे सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्दखरूप ही हैं।
देखो, एक ही भगवान्ने एक साथ अनेक गोपियों के साथ रमण किया तथा विदेह जनक और श्रुतदेव ब्राह्मण दोनों के घरों में एक ही साथ आतिथ्य ग्रहण किया।
इनके अतिरिक्त दुर्योधन ने भी अपनी समस्त सेना को श्रीकृष्णरूप ही देखा था। इससे विदित होता है कि श्रीकृष्णचन्द्र व्यापक आत्मा ईश्वर हरि ही हैं।
जब भृगुजी ने भगवान्‌ के वक्षःस्थल में पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपति के द्वेष्य हो गये थे? (नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं) भक्त, असुर और अन्य पुरुषों को भी वे एक-सा ही फल देते हैं।
इसलिये भगवान्‌ का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है। श्रीहरि तो सुन्दर मार्ग पर लगे हुए एक फळयुक्त वृक्ष के समान हैं।
पारस को यदि लोहे की शलाकाओं से भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा स्वर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओं को द्वेष से भी भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
शंका - आत्मा से तो इन समस्त जीवों की उत्पत्ति हुई है और संसार में सबसे अधिक प्रिय भी आत्मा ही है, किन्तु श्रीकृष्णचन्द्र में यह बात नहीं मिल सकती।
समाधान - बछड़ों को चुरा लेने के समय ब्रह्मा को मोहित करने के लिये भगवान्ने पृथक् पृथक् अवस्था, रूप, वासनाओं और भूषणों से युक्त गोप और बछड़ों को अपने आप से ही बना लिया था।
'जिस प्रकार अग्नि से छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती है उसी प्रकार आत्मा से विविध प्राणियों की उत्पत्ति होती है' इस श्रुति के अर्थ को सिद्ध करने के लिये ही भगवान्‌ ने अपने शरीर से उस जीव-समूह को रचा था।
एक दिन जब श्रीकृष्णचन्द्र यमुना के तट पर एक कुञ्ज में बछड़ों को चरा रहे थे और पास ही दूसरे गोष्ठ में वृद्ध गोपगण गौओं को चरा रहे थे
तो गौएँ दूर से ही अपने बछड़ों को देखकर स्नेह से व्याकुळ हो उनकी ओर दौड़कर चलीं तथा गोर्पो के बहुत कुछ रोकने पर भी न रुक सकीं।
दूध के उमड़ने से उनके स्तन पुनः पुनः बहने लगे और जिनके नये बछड़ों ने जन्म ले लिया था उन्होंने भी उमङ्ग में भर-कर अपने बछड़ों को पूर्ववत् लंबी-लंबी जीभों से चाटते हुए खूब दूध पिलाया।
गोपों ने भी अपने-अपने बालकों का सिर सूँघते हुए उन्हें उठा लिया। इस प्रकार उस समय एक क्षण के लिये वहाँ अलौकिक उत्साह की वृद्धि हुई।
ये सब ग्वालबाल और बछड़े पहले कृष्णरूप ही तो थे; इसलिये ऐसा करके श्रीकृष्णचन्द्र ने इनमें अपनी प्रियतमता को दिखा दिया।
उपनिषदों ने जो कहा है कि आत्मा पुत्र से, वित्त से तथा अन्य समस्त वस्तुओं से भी प्रियतर और आन्तरिक है, उसको भगवान्ने सत्य करके दिखा दिया।
शंका - आत्मा तो ऊँच-नीच सभी प्राणियों में समान है, फिर भगत्रान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन आदि में विषमभाव क्यों किया?
समाधान - ब्रह्मा ने वहरे, अन्धे, पङ्गु, मृक, छोटे, बड़े सभी बछड़ों को और ग्वालों को चतुर्भुजरूप ही देखा था।
उपनिषदों ने भी मच्छर से लेकर हाथीपर्यन्त त्रिलोकी के समस्त जीवों में भगवान्‌ की समता साक्षात् बतायी है।
शंका - आत्मा तो अभोक्ता है; यदि वासुदेव भी साक्षात् आत्मा ही हैं तो उन्होंने नाना प्रकार के छल-छन्दों से पर-स्त्रियों के साथ रमण क्यों किया?
समाधान - उन अति मनोहर, अभिनवरूप श्रीकृष्णचन्द्र को देखकर मोहित हुई गोपियाँ ही उनकी मन-ही-मन इच्छा करती थीं और (उनके न मिलने पर) कामातुरा होकर अत्यन्त विरहाकुला हो जाती थीं।
चलते-फिरते, उठते-बैठते, घर के कामों को करते तथा भोजनादि करते हुए हर समय श्रीकृष्णचन्द्र के अतिरिक्त उन्हें सामने पड़ी हुई भी कोई वस्तु दिखायी नहीं देती थी। (उन्हें सभी पदार्थ श्रीकृष्णमय प्रतीत होते थे)
दुःसह विरह-व्यया के कारण उत्पन्न हुए भ्रम से अपने पति, वृक्ष, मनुष्य और पशु आदि को भी 'ये हरि ही हैं' ऐसा जानकर वे प्रेमविभोर होकर अति वेग से आलिङ्गन कर लेती थीं।
साक्षात् नारायण भगवान् व्यास ने भी कहा है कि कोई गोपी कृष्ण बनकर पूतना बनी हुई दूसरी गोपी का स्तन-पान करती थी।
अतः यह सिद्ध होता है कि व्रजबालाएँ अपने-अपने पतियों को कृष्णरूप देखकर उन्हीं को आलिङ्गन करती थीं और यह समझती थी कि यह श्रीकृष्ण ही अपने-पराये समस्त मानव पति-पत्नियों के साक्षात् अन्तर्यामी हैं।
वास्तव में विचार किया जाय तो गुड़ और उसकी मधुरता के अभेद के समान यह नाशवान् मनुष्य-शरीर भी परमात्मारूप ही प्रतीत होगा।
फिर अपनी माया से अलौकिक कर्म करने वाले अनन्तशक्ति ईश्वर नृहरि के लीलामय शरीर की तो बात ही क्या है?
मिट्टी खाने पर कुपित होकर माता यशोदा ने जब मुँह खोला तो जिन्होंने उस (मुख) में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया, वे ही यदि स्वयं विश्वरूप हो गये तो क्या आश्चर्य है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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