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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 32
किं पुनरनन्तशक्तेर्लीलावपुरीश्वरस्येह । कर्माण्यलौकिकानि स्वमायया विदधतो नृहरेः ॥
फिर अपनी माया से अलौकिक कर्म करने वाले अनन्तशक्ति ईश्वर नृहरि के लीलामय शरीर की तो बात ही क्या है?
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