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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 31
परमार्थतो विचारे गुडतन्मधुरत्वदृष्टान्तात् । नश्वरमपि नरदेहं परमात्माकारतां याति ॥
वास्तव में विचार किया जाय तो गुड़ और उसकी मधुरता के अभेद के समान यह नाशवान् मनुष्य-शरीर भी परमात्मारूप ही प्रतीत होगा।
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