वक्षसि यदा जघान श्रीवत्सः श्रीपतेः स किं द्वेष्यः ।
भक्तानामसुराणामन्येषां वा फलं सदृशम् ॥
जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षःस्थल में पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपति के द्वेष्य हो गये थे? (नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं) भक्त, असुर और अन्य पुरुषों को भी वे एक-सा ही फल देते हैं।
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