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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 25
आत्मा तावदभोक्ता तथैव ननु वासुदेवश्चेत् । नानाकैतवयत्नैः पररमणीभिः कथं रमते ॥
शंका - आत्मा तो अभोक्ता है; यदि वासुदेव भी साक्षात् आत्मा ही हैं तो उन्होंने नाना प्रकार के छल-छन्दों से पर-स्त्रियों के साथ रमण क्यों किया?
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