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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 17
वत्सं निरीक्ष्य दूराद्गावः स्नेहेन संभ्रान्ताः । तदभिमुखं धावन्त्यः प्रययुर्गोपैश्च दुर्वाराः ॥
तो गौएँ दूर से ही अपने बछड़ों को देखकर स्नेह से व्याकुळ हो उनकी ओर दौड़कर चलीं तथा गोर्पो के बहुत कुछ रोकने पर भी न रुक सकीं।
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