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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 11
तस्मान्न कोऽपि शत्रुर्नो मित्रं नाप्युदासीनः । नृहरिः सन्मार्गस्थः सफलः शाखीव यदुनाथः ॥
इसलिये भगवान्‌ का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है। श्रीहरि तो सुन्दर मार्ग पर लगे हुए एक फळयुक्त वृक्ष के समान हैं।
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