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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 12
लोहशलाकनिवहैः स्पर्शाश्मनि भिद्यमानेऽपि । स्वर्णत्वमेति लौहं द्वेषादपि विद्विषां तथा प्राप्तिः ॥
पारस को यदि लोहे की शलाकाओं से भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा स्वर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओं को द्वेष से भी भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।
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