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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 28
दुःसहविरहभ्रान्त्या स्वपतीन्ददृशुस्तरून्नरांश्च पशून् । हरिरयमिति सुप्रीताः सरभसमालिङ्गयांचक्रुः ॥
दुःसह विरह-व्यया के कारण उत्पन्न हुए भ्रम से अपने पति, वृक्ष, मनुष्य और पशु आदि को भी 'ये हरि ही हैं' ऐसा जानकर वे प्रेमविभोर होकर अति वेग से आलिङ्गन कर लेती थीं।
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