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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 15
अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुद्रास्तु व्युच्चरन्तीति । श्रुत्यर्थं दर्शयितुं स्वतनोरतनोत्स जीवसंदोहम् ॥
'जिस प्रकार अग्नि से छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती है उसी प्रकार आत्मा से विविध प्राणियों की उत्पत्ति होती है' इस श्रुति के अर्थ को सिद्ध करने के लिये ही भगवान्‌ ने अपने शरीर से उस जीव-समूह को रचा था।
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