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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 18 • श्लोक 5
यद्विश्वरूपदर्शनसमये पार्थाय दत्तवान्भगवान् । दिव्यं चक्षुस्तस्माददृश्यता युज्यते नृहरौ ॥
भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुन को दिव्य-दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरि की अदृश्यता सिद्ध ही है (क्योंकि चर्म-चक्षुओं से न दोख सकने के कारण ही तो उन्होंने अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी थी)।
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