चलते-फिरते, उठते-बैठते, घर के कामों को करते तथा भोजनादि करते हुए हर समय श्रीकृष्णचन्द्र के अतिरिक्त उन्हें सामने पड़ी हुई भी कोई वस्तु दिखायी नहीं देती थी। (उन्हें सभी पदार्थ श्रीकृष्णमय प्रतीत होते थे)
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