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अध्याय 4 — अम्बास्तवः
पञ्चस्तवी
32 श्लोक • केवल अनुवाद
जिसे सभी मुनि-जन आद्य परा प्रकृति कहते हैं, जिसे वेदान्त-विद आचार्य-वर्ग विद्या नाम से विभूषित करते हैं और जिसने अपने अर्ध-शरीर के संपर्क से प्रफुल्लित बने हुए शंकर के स्वरूप को आनन्द प्रदान किया है उसी भगवती उपा देवी को मैं (अनन्य-शरण) जिसका उस भगवती के बिना कोई सहारा नहीं, प्रणाम करता हूँ।
हे माता! तुम्हारी स्तुति करने में अपौरुषेय अर्थात् जिनका परमेश्वर के बिना कोई करने वाला नहीं है ऐसी वेदों की सुन्दर रचनाएं भी कुण्ठित हो जाती हैं। मुझ मूर्ख बालक की यह प्रस्तुत, स्तुति असमीचीन होने पर भी आपको अवश्य आकर्षित और प्रसन्न करती ही है, क्योंकि आप का हृदय भक्तों के प्रेमभाव से सदैव स्नेह से द्रवीभूत होता है।
हे देवी! आप भाग्यशाली भक्त जनों के हृदय में, अपने परमानन्द-बोध स्वरूप से प्रवाहित होती हुई-परमाकाश रूप से, प्रकाश-रूपता से, विमर्श-रूपता से, चन्द्र-कला-रूपता से, सरस्वती के रूप से तथा पूर्णाहन्ता रूप मातृका के स्वरूप से विकसित होती हैं।
हे माता! जो भक्त-जन, हर्ष के कारण रोमांचित बने हुए शरीरों से बहते हुए प्रेमाश्रुओं से युक्त नेत्रों से तथा गद्गद् भरी वाणियों से आपके चरणों की उपासना सदा करते रहते हैं, वे ही तीनों भुवनों में पूर्णरूपेण भाग्यशाली हैं। भाव यह है कि ऐसे भक्तों का जन्म प्रशंसनीय है।
हे देवी! जो मुख आपको स्तुति करने में लगा हो, जो शिर आपको भक्ति से नमस्कार करता हो और हे माता! जो हृदय आपके ध्यान में तत्पर बना हो, वे मुख, सिर तथा हृदय किसी ही भाग्यशाली व्यक्ति को किन्हीं अलौकिक विशेष तपस्याओं के फल-स्वरूप प्राप्त होते हैं।
हे भवानी ! आप मूलाधार के आलवाल (वृक्षों की जड़ के पास जल-सिंचन के लिए बनाया हुआ गोलाकार स्थान) रूपी कुहर अर्थात् रन्ध्र से बिजली की रेखा की भांति उदित होकर षट्चक्ररूपी कमलों का भेदन करती हैं तदनन्तर पुनः उसी मूलाधार में प्रवेश करती हैं। इस भांति ब्रह्म-रन्ध्र मण्डल के सहस्रारचक्र में अवस्थित अमाकला रूपी परमानन्द से प्रवाहित उत्कृष्ट अमृत-जल से समस्त शरीर को अमृतमय बना देती हैं। तात्पर्य यह है कि जब कुण्डलिनी शक्ति का उदय साधक के शरीर में होता है तो उसका समस्त शरीर परमामृत-रस से सींचा जाता है।
हे देवी! जब महादेव जी ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया तो आपकी मोहित करने वाली तिरछी चितवन ने पुनः इस कामदेव रूपी कली को अनेकानेक दम्पति-वर्ग में जन्म दिया। अनुमान किया जाता है कि सत्यतः तभी से चन्द्र-कला-धारी शंकर ने लज्जा-वश इस तीसरे ललाट नेत्र को कुछ खुले और कुछ बन्द रूप से अर्धनिमीलित दशा में रखा है।
हे हिमालय पर्वतराज की पुत्री! जिन महादेव जी का जन्म अज्ञात है, जिनके वंश को कोई भी नहीं जानता, जो खप्पर में भिक्षा ग्रहण करते हैं, (जिनका निवासस्थान कोई नहीं है) जिनको पहनने के लिए कोई वस्त्र नहीं है - ऐसे अनिकेत अद्वितीय भगवान् शंकर को, आपके मंगलात्मक पाणिग्रहण करने से पूर्व भला कौन जानता था, कोई भी तो नहीं।
हे पर्वतराज की पुत्री! वस्त्रों के बदले मृगछाला का धारण करना, मुर्दों की राख समस्त शरीर में मलना, इधर-उधर भिक्षा के लिए मारे-मारे घूमना, प्रेत-भूमि में नाचना और वेताल-भैरव आदि के समूह का ग्रहण करना शिव को, आपके साथ चलने से ही शोभा को बढ़ाता है।
हे माता! खण्डपरशो टूटा कुल्हाड़ा जिसका आयुध है ऐसे शंकर जी का भयंकर ताण्डव नृत्य जो युगों की संहरण-क्रीड़ा में दक्ष है, वह भी आपके लास्यात्मक नृत्य-रूपता को देखने के फलस्वरूप अपनी चण्डरूपता अर्थात् भयंकर रूपता को छोड़कर अत्यन्त कोमल होकर जगत् को पुनः सुखपूर्वक स्थापित करने में परिणत हो जाता है।
हे कल्याणमयी माता! जिसका फिर से जन्म होने वाला नहीं है, अर्थात् जिस व्यक्ति को मोक्ष होने वाला है उस पुरुष के सभी पाश-पटल अर्थात् आणव, मायीय और कार्म - ये तीनों मल आप अपनी अनुग्राहिका-शक्ति से गुरुदेव की अनुकम्पा का आश्रय लेकर निमेष-मात्र में काट देती हैं और इस प्रकार शाम्भव रूपी वेधदीक्षा उसकी सिद्ध हो जाती है।
हे देवी! मोतियों के भूषणों से सुसज्जित, नये विदुमों की तरह लाल दीप्ति वाली (आप) जिस भक्त के हृदय में तारामण्डल से संयुक्त संध्या जैसी विकसित होती है, केवल वही एक भक्त, त्रिभुवन का (अर्थात् जाग्रत-स्वप्न और सुषुप्ति) इन तीन अवस्थाओं में शासन करने वाली (मनुष्य को नचाने वाली) इन्द्रिय-शक्तियां पांचवाणों अर्थात् रूपादि पांच विषयों का सेवन किए बिना ही कन्दर्प-रूपता को प्राप्त होता है, अर्थात् समस्त करणेश्वरी-चक्र का वह ईश्वर बन जाता है।
हे माता! अमृत बहाने वाली अपनी किरणों के समूह से तीनों लोकों को आप्यायन करने वाली आप अमृतेश्वरी का जो ध्यान करते हैं, निश्चित रूप से वे ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं से अलंघनीय अर्थात् पार न किये जाने वाले (भूत, भविष्यत और वर्तमान इस) काल-कलना को पार कर जाते हैं।
हे माता! (आप अपने चार हाथों में) स्फाटिकमणि की जपमाला, पुस्तक, कमण्डल और उपदेश करने के लिए उठाए हुए हाथों वाली हैं। आप पद्मासन पर विराजमान और शरद्-ऋतु के चन्द्रमा जैसी अत्यन्त श्वेतवर्ण में चमकती हुई हैं। इस प्रकार जो भक्त, आपका ध्यान अपने हृदय में करता है, वह सारे संसार के कवियों और तार्किक आचार्यवरों का चक्रवर्ती राजा बनता है।
(हे पार्वती जी) आप मोर पंखों के मुकुट को धारण करती हुई भूरे अर्थात् सुनहरी रंग के जटा-जूट से युक्त हैं। घुंघचियों की पहनी हुई माला आपके स्तनों की शोभा बढ़ाती है। आप श्यामा रूप को धारण करती हुई सुन्दर मुखाकृति और कोमल हाथों से युक्त हैं। इस प्रकार शिकारी का रूप धारण करने वाले शंकर जी की पत्नी शिकारिण का रूप धारण करने वाली आप भगवती की मैं स्तुति करता हूं।
हे मोहित करने वाली देवी! तुम्हारा शरीर नवीन लता के समान सुन्दर है, ऐसे किसलय-सदृश शरीर को शंकर जी को देकर और बदले में उनका कठोर तथा फूहड़ आधा भाग क्यों खरीदा इस भांति सखियों के हास-परिहास युक्त वचनों के प्रति आप केवल अपने मन्द मुस्कान से ही उनके इन परिहास-वचनों को टाल देती हैं। आपके ऐसा करने पर ही वे सखियां मूक बन जाती हैं और फिर से उन्हें ऐसा बोलने का साहस नहीं होता।
हे माता! यह माया रूपी संसार एक अथाह समुद्र है। इसमें अनेक विचित्र दुःखात्मक तरंगों की मालाएं विद्यमान हैं। अनेक ब्रह्माण्ड रूपी बुलबुलों का समूह इस सागर में पाया जाता है। आश्चर्य है कि जब भी इस ऐसे भयंकर सागर में कोई व्यक्ति आप का ध्यान, अनथक रूप से करता है, तब मानो कि आपका यह ध्यान भी महान वडवाग्नि बन जाता है और ये ऊपर वर्णित बुलबुलों से तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के दुःख रूपी तरंगों सहित संसार रूपी समुद्र, अण-मात्र में लय हो जाता है और संसार-समुद्र का नाम सदा के लिए मिट जाता है।
हे माता ! यद्यपि पारमार्थिक दृष्टि से आप भगवती एक ही स्वरूप वाली हो तथापि दक्षप्रजापति की कन्या होने से दाक्षायणी नाम से, साढ़े तोनबार मुड़ी होने से कुण्डलिनी-स्वरूप कुटिला नाम से, हृदय रूपी गुफा में ठहरने के फलस्वरूप गुहारणी नाम से, कत्य-ऋषि की कन्या होने से कात्यायनी नाम से, संकोचविकासात्मक धर्म-युक्त होने से कमला नाम से तथा सृष्टि आदि पांच कृत्यों के करने से कलावती नाम से नर्तकी की तरह अनेक स्वरूपों को धारण करती हुए दिखाई देती हो ।
हे शासन करने वाली देवी! आनन्द-स्वरूप तथा अहंपरामर्श रूपी नाद से परिणत बना हुआ, अनाहतस्वरूप वाले सहस्रार चक्र में जब अन्तर्मुख मन से आपका स्वरूप देखते हैं तो उस समय वे भाग्यशाली योगी-जन शब्दों से नहीं वरन् नेत्र-अश्रुओं से और पुलकित-भाव से ही उस आपके स्वरूप को जतलाते हैं।
हे जगन्माता! आप चन्द्रमा में चान्दनी हैं। सूर्यदेवता में प्रकाश हैं। पुरुष में चेतना हैं। वायु में बल अर्थात् वेग हैं। जल में मिठास हैं और अग्नि में ऊष्णता हैं अर्थात् आप ही समस्त भावाभावात्मक यानी दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले जगत् का सार हैं। सच तो यह है कि यदि आपकी सत्ता जागतिक पदार्थों में न हो तो ये सभी पदार्थ सत्ता-विहीन अर्थात् फीके हैं। भाव यह है कि आपकी विश्व-व्यापिनी शक्ति से ही सारा संसार अपनी स्वरूप-सत्ता से युक्त दृष्टिगोचर होता है।
हे माता! ये जो सितारे आकाश-मार्ग में इधर-उधर घूमते फिरते हैं, जो यह अन्तरिक्ष-तल वर्षा बहा देता है, जो यह शेषनाग इस समस्त पृथ्वी को धारण किए हुए है, जो यह वायु इधर-उधर चलता रहता है और जो यह अग्नि ऊर्ध्व-मार्ग से चलती हुई दिखाई देती है - यह सभी कुछ तो आप की आज्ञा से ही होता है।
हे पार्वती! जब आप अपने स्वरूप का संकोच करना चाहती हैं, तब आपका स्वरूप नाम-रूप की कलना से अतीत बन कर अनुलेख्य हो जाता है। साथ ही बह स्वरूप वाणी तथा मन का विषय बनकर उससे दूर बहुत दूर चला जाता है। इसके उलट जब आप अपनी स्वरूप-विकासात्मक अवस्था को ग्रहण करती हैं, तो उस दशा में ध्यान करने से भक्त जन आप के स्वरूप को सहज ही प्राप्त करते हैं।
जो भाग्यशाली जन, भोग अर्थात् सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए ही आपको प्रणाम करते हैं वे फलतः हजारों लक्ष्मियों को अपने नेत्रों के इशारों से हो अपनी दासियां बना देते हैं। इसके अतिरिक्त चिन्तामणि-रत्नों की ढेर से बनाये हुए पर्वत पर, जो उनके लिए क्रीड़ास्थल के रूप में निर्मित हुआ होता है, वे ऐसे ही पर्वत के कल्प-वृक्षों से प्रपूरित वनस्थली में अनन्त समय के लिए रमण करते हैं अर्थात् वहीं रहते हैं। भाव यह है कि जो भक्त सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए भी आपकी उपासना करते हैं उन्हें भी आप अपने असाधारण एवं अलौकिक ऐश्वर्य को प्रदान करती हैं।
हे जगत् का शासन करने वाली देवी ! सांसारिक मनुष्यों के सभी सन्ताप अर्थात् आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक दुःख आपके हो अधीन हैं अर्थात् आप ही उन दुःखों को उत्पन्न करती हैं - इत्यतः उन सांसारिक व्यक्तियों पर दया करके वे दुःख नष्ट करने में आप ही समर्थ हैं। जैसे सूर्य भगवान् की किरणों का समूह गर्मी को उत्पन्न करता है और फिर से वर्षा-रूप में परिणत होकर एक बारगी उसे शान्त कर देता है।
हे चन्द्रकलाधारी भगवान् शंकर की शक्ति भगवती ! आप ही परा, परापरा और अपरा शक्ति हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीर भी आप ही हैं। अधिदैव अर्थात् शरीर में ठहरा हुआ परमात्मा का स्वरूप तथा उस शरीर में स्थित जीवात्मा का स्वरूप आप ही हैं। आप ही ज्ञानशक्ति, क्रिया-शक्ति, तथा इन्द्रियों का समूह भी हैं। परदशा में जो आपका आसन ईश्वर प्रेत-रूपता में ठहरा है, वह भी आप ही हैं। इच्छा-शक्ति, सर्वज्ञतादि ऐश्वर्य तथा तीन आणव-मल इत्यादि आवरण भी आप ही हैं, इसके अतिरिक्त आयतन परमेश्वर का निवास स्थान (मन्दिर) भी आप ही हैं। भाव यह - है कि वह कौन सी वस्तु है जो आप नहीं हैं।
हे माता! आप पृथ्वी में निवृत्ति-कला, जल-तत्त्व में प्रतिष्ठा-कला, अग्नि तत्त्व में विद्या-कला, वायु-तत्त्व में शान्ता-कला और आकाश-तत्त्व में शान्ता तोता कला उदित हुई हैं - इस प्रकार जो ये उपर्युक्त पांच कलाएं छत्तीस-तत्त्व रूप जगत् का निर्माण करती हैं, उन समस्त कलाओं से परे आपका स्वरूप है अर्थात् आपका स्थान सर्वोत्कृष्ट है।
हे जगत् को अपने स्वरूप में शरण देने वाली माता! जब तक आपके प्रकाशविमर्शात्मक चरण-कमल-युगल को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया जाता है तब तक समस्त मतवादी-जन के संकल्प-विकल्प से दुरुह, कठिन बने हुए तथा दृष्ट अर्थात् कुतर्क-वितर्क से युक्त परस्पर वाद-विवाद करने की टॅव (आदत) समाप्त नहीं होती। भाव यह है कि जब तक साधक को स्वरूप-लाभात्मक आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, तब तक वह वाद-विवाद के झमेले में पड़ा रहता है। जब साधक को साक्षात्कार का लाभ होता है तो फिर उसे मौन में ही प्रत्येक निधि छिपी रहती है।
हे पार्वती। कई विरले भक्त-जन देवयान अर्थात् उत्तरायण रूपी अपान-गति तथा दक्षिणान अर्थात् प्राण-गति-दोनों को काटकर, इन्द्रिय-मण्डल के सम्राट बने हुए मन को आपके (गति-विहीन सुषुम्ना-धाम) रूप मार्ग में लय करते हैं। ऐसा करने पर वे पांच कारणों अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव के मुकुटों को अपना आसन बना देते हैं। तात्पर्य यह है कि जो परमयोगी प्राणापान की गति को रोककर सुषुम्ना-मार्ग में प्रविष्ट होते हैं, वे ब्रह्मा आदि पांच कारणों के स्थान को भी तुच्छ समझते हैं और साथ ही सृष्ट्यादि पांच कृत्यों के नायक बन कर परमोत्कृष्ट शिवधाम को प्राप्त करते हैं।
हे माता! पृथ्वी इत्यादि जो आपका स्थूल स्वरूप है, उसमें से किसी एक स्वरूप के विभव का निर्णय बृहस्पति पाद भी करने में असमर्थ हैं, उसी आप के स्वरूप के ऐश्वर्य का गुण-गान (मैं अल्पज्ञ मूर्ख) करने का साहस कर रहा हूं अर्थात् आपके पारमार्थिक स्वरूप की स्तुति कर रहा हूं अतः इस मेरी धृष्टता पर आप महानुभाव-स्वभाव वाली माता क्षमा करेंगी यह मेरी आशा है।
हे माता! कलाध्वा, तत्त्वाध्वा, भुवनाध्वा, वर्णाध्वा, मन्त्राध्वा और पदाध्वा - इन छः-स्वरूप वाले संसार को शुद्ध करने में अर्थात् स्वरूपविश्रान्त्यात्मक संहार करने में जो भक्त-जन आपके स्वरूप का ध्यान करोड़ों कालाग्निरुद्रों के समान बना हुआ करते हैं तथा समस्त संसार-मण्डल का आप्लावन करने में आपका स्वरूप अमृत-पूर्ण वर्षा की तरह देखते हैं तथा इस जगत्-मण्डल का सृजन करने में आपके स्वरूप को कृष्ण-वर्ण से युक्त एवं बोझिल बने हुए स्तनों अर्थात् ज्ञान-क्रिया शक्ति के विकास से युक्त बना हुआ ध्यान करते हैं, वे जन तत्काल ही तीनों लोकों के गुरु बन जाते हैं अर्थात् तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करते हैं।
हे माता! कई तो आपको विद्या का स्वरूप मानते हैं। कई आकाश अर्थात् शून्य-स्वरूप मानते हैं। कुछ लोग आपको आनन्द-स्वरूप ही मानते हैं। कई माया का स्वरूप मानते हैं और कई जन आपको विश्वाकार बतलाते हैं। हम तो आपके स्वरूप को अनन्त-करुणा-पूर्ण साक्षात् गुरु-रूप ही मानते हैं।
हे समस्त भुवनों की मांता! आपका (श्रेष्ठ) स्वरूप कुवलय नामी पुष्पों के पत्ते के समान नीला तथा भूरे चिकने केशों से युक्त है। इसके अतिरिक्त ज्ञान-क्रिया रूपी स्तनों की फैलावट से युक्त आपका सुन्दर वक्षस्थल से सुशोभित शरीर, महादेव के शरीर के साथ सदैव लगा रहता है। ज्यादा कहने से इस समय क्या लाभ है - आपका यह स्वरूप हमें सदा के लिए प्रकट रहे।
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धर्म का अन्वेषण
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