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पञ्चस्तवी • अध्याय 4 • श्लोक 5
वक्त्रं यदुद्यतमभिष्ठतये भवत्या- स्तुभ्यं नमो यदपि देवि ! शिरः करोति । चेतश्च यत्त्वयि परायणमम्ब ! तानि कस्यापि कैरपि भवन्ति तपोविशेषैः ।।
हे देवी! जो मुख आपको स्तुति करने में लगा हो, जो शिर आपको भक्ति से नमस्कार करता हो और हे माता! जो हृदय आपके ध्यान में तत्पर बना हो, वे मुख, सिर तथा हृदय किसी ही भाग्यशाली व्यक्ति को किन्हीं अलौकिक विशेष तपस्याओं के फल-स्वरूप प्राप्त होते हैं।
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